संवादाता सतनाम सिंह पाकुड़।
पाकुड़: पाकुड़ जिले की रीड की हड्डी कहे जाने वाला पत्थर उद्योग जो पाकुड़ जिले के कुल 6 प्रखंडों में क्रशर और पत्थर खदान जिले का मुख्य उद्योग माना जाता था. जो इन दिनों सैकडों की संख्या में बंद पड़े है. जिले में सभी प्रखंडों को मिलाकर कुल 200 से अधिक वैध पत्थर खदान और 500 से अधिक क्रशर संचालित थी. लेकिन मौजूदा समय में पूरे जिले में सीमित संख्या में क्रशर और पत्थर खदान चालू है. बाकी के सभी खदान और क्रशर बंद हो गये हैं.
हज़ारों मजदूर हुए बेकार, पलायन को हुए मजबूर
जानकारी के मुताबिक जिला भर में पत्थर खदान और क्रशर से करीब 40 हज़ार से ज़्यादा मजदूरों का पेट पलता था. क्रशर और खदान बंद होने से सभी मजदूर बेकार हो गये हैं. गंभीर हालात से जूझ रहे तमाम मजदूर देश के दूसरे शहर का रूख कर रहे हैं. हर रोज सैंकड़ों की संख्या में क्रशर और पत्थर खदान में काम करने वाले मजदूर लाचारी की गठरी लेकर गांव छोड़ चले गए हैं. चारो तरफ़ से हताश होने के बाद ही वो पलायन को विवश हो रहे हैं.

क्रशर और खदान संचालक खनन विभाग से है परेशान,उदय लखवानी
पत्थर खदान और क्रशर के बंद होने से मजदूरों के सामने रोटी की समस्या खड़ी हो गई तो खदान संचालक भी भारी नुकसान झेल रहे हैं. खदान और क्रशर संचालकों का कहना है कि हर रोज किसी ना किसी कागज़ात के नाम पर उनके क्रशर और खदानों को सील किया गया है. जब कागज़ातों के लिए अर्जी दी जाती है तो खनन विभाग समेत अन्य विभागों के द्वारा महीनों दौड़ाया जाता है. लिहाज़ा वो भी आज की व्यवस्था से हार चुके हैं.
क्षेत्र में रोजी रोजगार बंद होने से दो वक्त की रोटी जुटा पाना मुश्किल–उदय लखवानी
कांग्रेस प्रदेश महासचिव उदय लखवानी ने कहा कि क्रशर और खदान बंद होने से मजदूरों की स्थिति दयनीय हो चुकी है. जिसके कारण पाकुड़ के बाज़ार की रौनक भी खत्म होने लगी है. उन्होंने कहा कि पत्थर खदान एवं क्रशर बंद होने से जिले के पत्थर व्यवसाई की स्थिति भी चिंताजनक हो गई है. लेकिन पदाधिकारियों के कान में जूं तक नहीं रेंगती है. उदय लखवानी ने बताया कि इस को लेकर ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम को को अवगत कराया जाएगा जिसमें पाकुड़ के पत्थर व्यवसायियों के पुराने दिन वापस आ सके।
बताते चले साल 2020 से 23 तक पाकुड़ जिले में सैकड़ों पत्थर खदान की लीज समाप्त हो चुकी है जिनपर सैकडों क्रेशर मशीन निर्भर थे,जो तीन सालों से बंद चल रहे है पत्थर के अभाव के कारण,सरकार और प्रशासन के द्वारा न ही लीज रिनुअल दिया गया और ना ही नए पत्थर खदान की लीज स्वीकृत की गई है,अब तो आलम यह है कि कुछ क्रेसर मालिक अपने मशीनों को कबाड़ी में बेच रहे है तो कुछ मशीनों के कल पुर्जे बेच कर जीवन यापन कर रहे है और कुछ तो इंतजार की मुद्रा में है की नए लीज स्वीकृत होंगे और अच्छे दिन वापस आयेंगे।








