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January 26, 2026 1:27 am

दलदल में फंसी व्यवस्था: प्रसव पीड़ा में तड़पती महिला को खटिया पर लादकर पहुंचाया अस्पताल, कीचड़ में धंसी एंबुलेंस।

इकबाल हुसैन

पाकुड़ (महेशपुर)। यह डिजिटल भारत 2025 है, लेकिन बोरियो गांव की तस्वीर 1950 जैसी—जहां एक गर्भवती महिला को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए खटिया को स्ट्रेचर बनाया गया, और एंबुलेंस कीचड़ में घंटों तक धंसी रही। इस दृश्य ने सिर्फ एक महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि सरकारी दावों की पोल खोल दी है। महेशपुर प्रखंड की अस्कंधा पंचायत के बोरियो गांव की एलीजाबेथ हेंब्रम को जब प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तो परिजनों के पास एंबुलेंस तक पहुंचाने का कोई और रास्ता नहीं था, सिवाय उसे चारपाई पर लिटाकर कीचड़ से गुजरने के। गाँव से करीब 2 किलोमीटर दूर खड़ी एंबुलेंस भी रास्ते कीचड़ में बुरी तरह फंस गई। यह मंजर जिसने देखा, उसकी आंखें नम हो गईं।

2 किलोमीटर की दलदल यात्रा, फिर भी कोई गारंटी नहीं कि अगली बार एंबुलेंस समय पर पहुंचे

गांववालों के मुताबिक, बरसात में यह रास्ता पूरी तरह तालाब में तब्दील हो जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर बीमार तक—हर किसी के लिए यह रास्ता एक संकट की सुरंग बन जाता है।

“हर साल वोट मांगने वाले आते हैं, लेकिन सड़क नहीं आती,” – मातल सोरेन, ग्रामीण।

जनप्रतिनिधि आश्वासन दे गए, अब इंतजार ‘डस्ट’ गिराने का

घटना के बाद झामुमो की केंद्रीय समिति सदस्य उपासना मरांडी ने कहा की “डीएमएफटी फंड से सड़क निर्माण की प्रक्रिया जारी है, जब तक पक्की सड़क नहीं बनती, तब तक डस्ट गिराकर रास्ता दुरुस्त किया जाएगा।” मगर सवाल उठता है—क्या तब तक किसी और की जान जाएगी?

यह सिर्फ एक एंबुलेंस नहीं थी जो कीचड़ में फंसी, जवाबदेही भी वहीं धंसी पड़ी है

बोरियो की कहानी भारत के उन हजारों गांवों की कहानी है, जहां अब भी सड़क का सपना लोग आँखों में लेकर मर जाते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने सिर्फ प्रशासन की नहीं, हमारी संवेदनाओं की भी परीक्षा ली है।

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