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January 24, 2026 1:09 am

पाकुड़ का पैसा, हावड़ा की चमक,अरबों देना वाला स्टेशन सुविधाओं से वंचित, जनता ठगी महसूस कर रही।

सतनाम सिंह

पाकुड़ जिला आज झारखंड के उन चुनिंदा जिलों में खड़ा है, जो राज्य को सबसे अधिक राजस्व देने में अग्रिम पंक्ति में शामिल हैं। राजस्व योगदान के मामले में पाकुड़ झारखंड में तीसरे स्थान पर है और हावड़ा डिवीजन को हर साल अरबों का भाड़ा के रूप में राजस्व देना वाला पाकुड़ दूसरे पायदान पर आता है। इसके बावजूद हावड़ा डिवीजन द्वारा पाकुड़ जिले के साथ किया जा रहा व्यवहार न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि सीधे तौर पर भेदभाव और उपेक्षा की तस्वीर पेश करता है। पाकुड़ की धरती से काला सोना कहे जाने वाले पत्थर, कोयला और अन्य खनिजों का मालगाड़ियों के जरिए सालाना हजारों करोड़ रुपये का परिवहन हो रहा है। इस कमाई का बड़ा हिस्सा हावड़ा डिवीजन की झोली में जा रहा है। बंगाल के कई रेलवे स्टेशन पाकुड़ के राजस्व से चमक रहे हैं, लेकिन खुद पाकुड़ बुनियादी रेल सुविधाओं के लिए तरस रहा है। स्थिति यह है कि पाकुड़ से दिल्ली के लिए एक भी सीधी ट्रेन नहीं है। वंदे भारत का ठहराव नहीं, शताब्दी जैसी प्रीमियम ट्रेनें यहां नहीं रुकतीं। बैंगलोर–गुवाहाटी एक्सप्रेस का भी ठहराव नहीं है। मालदा से चलने वाली पैसेंजर ट्रेन को बंद कर दिया गया। कटिहार, धनबाद और आसनसोल जैसे महत्वपूर्ण रेल जंक्शनों के लिए भी सीधी ट्रेन की सुविधा नहीं है। आरोप साफ है कि हावड़ा डिवीजन सिर्फ पाकुड़ को लूटकर अपनी झोली भरने का काम कर रहा है। बड़े राजस्व वाले स्टेशन होने के बावजूद यात्रियों को आज भी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। रेलवे की बदहाल व्यवस्था के कारण लोगों को मजबूरी में बाया टोटो जैसे अस्थायी और असुविधाजनक साधनों का सहारा लेना पड़ रहा है। ट्रेनों की संख्या, ठहराव, यात्री सुविधाएं और आधारभूत ढांचे के मामले में पाकुड़ को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। इससे भी ज्यादा गंभीर सवाल तब खड़ा होता है, जब यह देखा जाता है कि हावड़ा डिवीजन के अधिकारी, पदाधिकारी और राजनीतिक नेतृत्व इस भेदभाव पर चुप्पी साधे हुए हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि पाकुड़ के दिग्गज राजनीतिक नेता भी इस मुद्दे पर खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं। इतनी बड़ी अनदेखी के बावजूद ठोस आवाज क्यों नहीं उठ रही, यह सवाल आम जनता के मन में गूंज रहा है। क्या पाकुड़ सिर्फ राजस्व देने वाला जिला बनकर रह जाएगा और बदले में उसे उपेक्षा ही मिलेगी? अब यह साफ हो चुका है कि बिना दबाव के हावड़ा डिवीजन का रवैया बदलने वाला नहीं है।
ऐसे में एक व्यापक और संगठित जन आंदोलन समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है। यह आंदोलन ऐसा होना चाहिए, जिसमें सभी राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और आम जनता एक मंच पर खड़ी हो। जब तक एकजुट होकर आवाज नहीं उठेगी, तब तक हावड़ा से लेकर दिल्ली तक पाकुड़ की पीड़ा नहीं पहुंचेगी। सीधी और साफ बात है कि अब पाकुड़ को हावड़ा डिवीजन के साथ बने रहने पर गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए। यदि जन आंदोलन के जरिए यह संदेश मजबूती से गया, तो भविष्य में कोई भी डिवीजन पाकुड़ के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार करने की हिम्मत नहीं करेगा। हावड़ा से सिलीगुड़ी के बीच झारखंड का एकमात्र बड़ा रेलवे स्टेशन पाकुड़ है, जो अरबों रुपये का राजस्व देता है। इसके बावजूद उपेक्षा किया जाना पूरी रेलवे व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यह सिर्फ पाकुड़ की लड़ाई नहीं है, यह झारखंड के सम्मान, अधिकार और हिस्सेदारी की लड़ाई है। अब चुप रहने का समय खत्म हो चुका है, क्योंकि इतिहास गवाह है—जब हक की आवाज सड़क से संसद तक गूंजती है, तभी व्यवस्था को झुकना पड़ता है।

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