भारत की कृषि व्यवस्था में रवि फसलें सिर्फ एक मौसम की खेती नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव हैं। सर्दियों में बोई जाने वाली और गर्मी की शुरुआत में कटने वाली रवि फसलें—जैसे गेहूं, चना, मसूर, सरसों, मटर और जौ—करोड़ों लोगों के भोजन और लाखों किसानों की आजीविका का आधार हैं।
खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी हिस्सेदारी।
रवि फसलें देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में अहम योगदान देती हैं। गेहूं भारत का प्रमुख खाद्यान्न है, जो रोजाना करोड़ों परिवारों की थाली तक पहुंचता है। वहीं चना और मसूर जैसी दलहन फसलें प्रोटीन की जरूरत पूरी करती हैं और सरसों जैसी तिलहन फसलें खाद्य तेल उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी सिंचाई आधारित खेती के कारण रवि फसलें अपेक्षाकृत स्थिर उत्पादन देती हैं, जिससे किसानों को भरोसा मिलता है।
गुणवत्ता तय करती है कीमत।
रवि फसलों की गुणवत्ता सीधे किसानों की कमाई से जुड़ी है। चमकदार और सही नमी वाले गेहूं के दाने, बड़े और साफ दलहन, तथा तेल से भरपूर तिलहन—ये सभी बाजार में बेहतर दाम दिलाते हैं। गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उन्नत बीज, संतुलित खाद, समय पर सिंचाई और वैज्ञानिक खेती जरूरी है। कटाई के बाद सही भंडारण नहीं हुआ तो नमी और कीट फसल की कीमत गिरा देते हैं।
किसानों की मुश्किलें बढ़ीं।
रवि खेती आज कई चुनौतियों से जूझ रही है। भूमिगत जल स्तर गिरने से सिंचाई महंगी हो रही है। बिजली और डीजल के दाम बढ़ने से लागत लगातार बढ़ रही है। मौसम की मार भी कम नहीं—असमय बारिश, पाला, ओलावृष्टि और तापमान में उतार-चढ़ाव से फसल और उसकी गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं। कई बार कटाई के समय हुई बारिश से गेहूं और सरसों खराब हो जाते हैं, जिससे किसानों को कम कीमत मिलती है।
इसके अलावा खाद-कीटनाशकों की महंगाई, मजदूरों की कमी और बाजार में उचित दाम न मिलना किसानों की परेशानी बढ़ा रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित होने के बावजूद छोटे और सीमांत किसानों तक इसका पूरा लाभ नहीं पहुंच पा रहा।
आगे की राह क्या?
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई, मौसम आधारित सलाह, फसल बीमा और किसानों को सीधे बाजार से जोड़ने से हालात सुधर सकते हैं। साथ ही आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण से खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। रवि फसलें देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय की मजबूत ढाल हैं। यदि गुणवत्ता पर जोर दिया जाए और चुनौतियों का ठोस समाधान हो, तो यही रवि फसलें किसानों की आर्थिक तस्वीर बदलने की ताकत रखती हैं।








