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January 23, 2026 5:20 pm

नगर निगम या ‘नरक निगम’? मेदिनीनगर की हकीकत पर तीखे सवाल



पत्रकार अंकित कुमार लाल

मेदिनीनगर नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। सामाजिक कार्यकर्ता अख्तर जमा द्वारा अपने इंटरव्यू में नगर निगम को “नरक निगम” कहे जाने के बयान ने शहर की बदहाल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि शब्दों की मर्यादा पर बहस हो सकती है, लेकिन उनके बयान के पीछे उठाए गए मुद्दे आज शहर की आम जनता की पीड़ा को उजागर करते हैं।

शहर में पेयजल संकट, गंदे पानी की आपूर्ति, नालियों की जाम स्थिति, कचरा प्रबंधन की विफलता और जाम जैसी समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। टैंकर और पाइपलाइन से आने वाले पानी की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई मोहल्लों में नाली का पानी पीने के पानी में मिलने की शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन नगर निगम के पास जल गुणवत्ता जांच की ठोस और पारदर्शी व्यवस्था दिखाई नहीं देती।

मरीन ड्राइव या सैंड ड्राइव?

शहर में बनाए गए तथाकथित मरीन ड्राइव पर भी सवाल उठे हैं। मुंबई और पटना के मरीन ड्राइव/रिवर फ्रंट जहां सालभर पानी से भरे रहते हैं, वहीं मेदिनीनगर का रिवर फ्रंट वर्ष में केवल दो-तीन महीने ही पानी दिखाता है। बाकी समय सूखी रेत नजर आती है। ऐसे में इसे “मरीन ड्राइव” कहना भ्रामक बताया जा रहा है और इसे “सेंड ड्राइव” कहे जाने की चर्चा हो रही है।

योजनाएं बनीं, लेकिन चली नहीं

अंबेडकर पार्क में लगाई गई म्यूजिकल फाउंटेन कुछ ही समय बाद बंद हो गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि जलजमाव और रखरखाव के अभाव में यह योजना दम तोड़ गई। यह सवाल भी उठाया गया कि करोड़ों की लागत से बनी योजनाओं की मेंटेनेंस जिम्मेदारी आखिर किसकी है।

बजट और ऑडिट पर सवाल

नगर निगम के 2018 से 2023 के कार्यकाल को “स्वर्णिम काल” कहे जाने पर भी आपत्ति जताई जा रही है। सवाल यह है कि यदि यह कार्यकाल स्वर्णिम था, तो—

* शहर की सड़कें, नालियां और सफाई व्यवस्था क्यों बदहाल हैं?
* 600 करोड़ रुपये के कथित बजट का स्पष्ट हिसाब जनता के सामने क्यों नहीं रखा गया?
* नगर निगम अपने कार्यों का सार्वजनिक ऑडिट क्यों नहीं करता?

*महिलाओं के नाम पर कार्यक्रम, सशक्तिकरण कहां?*

आलोचकों का कहना है कि महिलाओं के नाम पर केवल डांडिया नाइट्स और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, लेकिन महिला सशक्तिकरण से जुड़े स्थायी और ठोस कार्य दिखाई नहीं देते। यही नहीं, महिला नेतृत्व के सवालों पर अक्सर पुरुष प्रतिनिधियों द्वारा जवाब दिए जाने को भी गलत परंपरा बताया गया।

जनता की अपेक्षा: जवाबदेह नेतृत्व

आगामी चुनावों को लेकर भी जनता में असंतोष दिख रहा है। लोगों का कहना है कि चुनाव के समय ही नेता जनता के बीच नजर आते हैं। शहर को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो 24×7 उपलब्ध रहे, फोन उठाए और बिना कैमरे की जांच के जनता से मिले।

कुल मिलाकर, “नरक निगम” शब्द भले ही कठोर हो, लेकिन उसके पीछे उठे सवालों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अब देखना यह होगा कि नगर निगम और जनप्रतिनिधि इन सवालों का ठोस जवाब और समाधान अपने कामों से कब देते हैं।

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