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February 11, 2026 11:54 am

साहिबगंज को सुविधाओं की मलाई, पाकुड़ को फिर थमाया गया झुनझुना

रेल आंदोलन के बाद भी पाकुड़ को निराशा, हावड़ा डिवीजन पर सौतेले व्यवहार का आरोप

पाकुड़: रेल सुविधाओं की मांग को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के नेतृत्व में हुए आंदोलन को पाकुड़ में जबरदस्त जनसमर्थन मिला। वजह साफ है—जिला वर्षों से विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है। जनता का आरोप है कि पाकुड़ से रेलवे ने पत्थर और कोयले के जरिए करोड़ों की कमाई की, लेकिन बदले में जिले को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं हुईं।रेल रैक पत्थर और कोयला लोडिंग ठप होने के बाद हावड़ा डिवीजन हरकत में तो आया, लेकिन फैसले के वक्त तस्वीर साफ हो गई। सुविधाओं की पूरी मलाई साहिबगंज को दे दी गई और पाकुड़ को एक बार फिर नजरअंदाज कर दिया गया।

पाकुड़ को क्या मिला?

रेलवे ने पाकुड़ को शताब्दी एक्सप्रेस और एक पैसेंजर ट्रेन देने की बात कही—वह भी सिर्फ भागलपुर तक। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सुविधा नहीं, बल्कि जनता के हाथ में थमाया गया सांत्वना का झुनझुना है।
आम यात्रियों, मजदूरों, छात्रों और मरीजों के लिए इससे कोई ठोस राहत नहीं मिलने वाली।

कमाई पाकुड़ से, सुविधा दूसरे जिले को

जनता में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि जिस पाकुड़ से रेलवे को राजस्व मिलता है, उसी जिले को बार-बार उपेक्षित किया जा रहा है। लोग खुलकर कह रहे हैं कि अंग्रेजों ने देश को लूटा और हावड़ा डिवीजन ने पाकुड़ को।जिस थाली से कमाया, उसी में छेद करने जैसा व्यवहार किया जा रहा है।

स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल, ट्रेन ही है इलाज का सहारा

पाकुड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। जिले में विशेषज्ञ डॉक्टरों और बेहतर इलाज की भारी कमी है। ऐसे में गंभीर मरीजों को मजबूरी में पश्चिम बंगाल के रामपुरहाट, वर्धमान और कोलकाता जाना पड़ता है।स्थानीय लोगों के अनुसार कोरोना काल से पहले चलने वाली लोकल ट्रेनें मरीजों के लिए जीवनरेखा थीं। उन ट्रेनों के परिचालन से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को इलाज के लिए सस्ता और सुरक्षित साधन मिलता था। लेकिन कोरोना के दौरान बंद की गई लोकल ट्रेनों का अब तक परिचालन शुरू नहीं किया गया है।नतीजा यह है कि मरीजों को महंगे निजी वाहनों या सीमित साधनों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे समय पर इलाज और जेब—दोनों पर असर पड़ रहा है।

जनता का सवाल—कब तक झुनझुना?

पाकुड़ की जनता शांत जरूर है, लेकिन अब सब्र टूटता दिख रहा है। लोगों का कहना है कि अब सिर्फ आश्वासन नहीं, ठोस फैसले चाहिए।
स्थानीय जनमानस मानता है कि अगर जल्द ही लोकल ट्रेनों का परिचालन शुरू नहीं हुआ और पाकुड़ को उसका हक नहीं मिला, तो एक बड़े जन आंदोलन की जमीन तैयार है।साफ संदेश है—
पाकुड़ अब झुनझुना नहीं, पूरा हक चाहता है।

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