सांसद निशिकांत का ‘सिंबल ज्ञान’ नहीं आया काम, जनता ने दिया अलग ही एग्जाम
रोड शो, नारे और ‘डायलॉगबाज़ी हूए फुस्स
पाकुड़: पाकुड़ नगर परिषद चुनाव इस बार सिर्फ वोटों की गिनती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक डायलॉग ने पूरे चुनावी माहौल को मसालेदार बना दिया। गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे चुनाव के दौरान सम्पा साह के प्रचार प्रचार के लिए पाकुड़ पहुंचे थे उन्होंने रोड से भी किया, भाजपा कार्यालय में प्रेस वार्ता के मंच से पूरे जोश में कहा था—“बाल्टी छाप ही कमल है और कमल ही बाल्टी छाप है।बस, फिर क्या था! शहर की राजनीति में यह बयान ऐसे फैला जैसे व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी को नया सिलेबस मिल गया हो। चौक-चौराहों पर चर्चा, पान दुकानों पर बहस और सोशल मीडिया पर मीम—हर जगह एक ही सवाल, “आखिर वोट डालें तो डालें कहाँ?”
रोड शो, नारे और ‘डायलॉगबाज़ी हूए फुस्स
सांसद जी ने पूरे दमखम के साथ पैदल रोड शो किया। गाड़ियां चलीं, झंडे लहराए, समर्थकों ने नारे लगाए। मंच से बार-बार प्रतीकों की समानता का संदेश दिया गया, ताकि वोटरों को ‘कन्फ्यूजन फ्री’ फॉर्मूला समझाया जा सके।राजनीतिक जानकार इसे चुनावी गणित का मास्टरस्ट्रोक बता रहे थे।लेकिन जनता ने इस डायलॉग को अपने अंदाज में लिया। कई जगहों पर मजाक उड़ने लगा—“अगर बाल्टी ही कमल है, तो फिर पहचान क्या है?” कुछ युवाओं ने तो इसे “इलेक्शन का सबसे बड़ा ट्विस्ट” बता दिया। कुछ लोग यह भी बता रहे हैं कि उनके बयान बाजी सबरी पाल के लिए अवसर बनता गया।शुक्रवार को जब मतपेटियां खुलीं तो सीन बदल चुका था। जिस रणनीति को लेकर इतना आत्मविश्वास दिखाया गया था, वह जमीन पर असर नहीं दिखा सकी। नतीजों ने साफ कर दिया कि चुनावी डायलॉग और मतदाताओं का फैसला दो अलग-अलग पटकथाएं हैं।राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा है कि क्या प्रतीकों को जोड़ने वाली रणनीति उलटी पड़ गई? क्या मतदाता इसे गंभीरता से नहीं ले पाए? या फिर स्थानीय मुद्दों ने बड़े मंचों के संवाद को पीछे छोड़ दिया?पाकुड़ की जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि चुनाव सिर्फ नारों और डायलॉग से नहीं जीते जाते। मंच पर बोला गया संवाद चाहे जितना तालियां बटोर ले, असली फैसला मतपेटी में बंद पर्ची ही करती है।इस चुनाव ने सिखा दिया—राजनीति में स्क्रिप्ट चाहे कोई भी लिखे, आखिरी एडिट जनता ही करती है।








