लेखिका: मारसिदा खातून, पाकुड़
यह कथन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत तथा महान विचारक और समाज-सुधारक स्वामी विवेकानंद का है। यह स्पष्ट करता है कि जीवन में सफलता न तो संयोग से मिलती है और न ही रातों-रात प्राप्त होती है, बल्कि निरंतर प्रयास, धैर्य और अडिग संकल्प का परिणाम होती है। लक्ष्य की ओर सतत अग्रसर रहना ही युवावस्था का वास्तविक सार है और यही विचार राष्ट्रीय युवा दिवस की मूल भावना को परिभाषित करता है। युवाओं को समर्पित 12 जनवरी का यह विशेष दिवस स्वामी विवेकानंद की जन्मतिथि के अवसर पर प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक स्मृति-दिवस नहीं, बल्कि भारत के युवाओं की ताज़ी ऊर्जा, उनके भीतर के जोश और अपार संभावनाओं को सही मार्गदर्शन देने का सशक्त माध्यम है। सामान्यतः 15 से 29 वर्ष (कुछ संदर्भों में 34 वर्ष तक) की आयु-सीमा को युवा अवस्था माना जाता है। राष्ट्रीय युवा दिवस का उद्देश्य युवाओं में लक्ष्य-बोध और राष्ट्र-निर्माण की भावना को जाग्रत करना है, ताकि उनकी आंतरिक प्रेरणा आत्मविश्वास, सुदृढ़ चरित्र और स्पष्ट उद्देश्य के साथ सही दिशा प्राप्त कर सके। इसी दृष्टि से शिक्षा, चरित्र-निर्माण, देशभक्ति और नैतिक मूल्यों को युवाओं तक पहुँचाने पर विशेष बल दिया जाता है, जिससे वे ईमानदार, नैतिक और जिम्मेदार नागरिक बनकर अपने विचारों और कर्मों के माध्यम से राष्ट्र को सही दिशा दे सकें। इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो भारत सरकार ने वर्ष 1984 में 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया, जिसे 1985 से पूरे देश में आधिकारिक रूप से लागू किया गया। इस निर्णय का मूल उद्देश्य स्वामी विवेकानंद की उस विचारधारा को युवा पीढ़ी के जीवन से जोड़ना था, जिसमें साहसिक चेतना, आत्मविश्वास और राष्ट्र-सेवा को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनका वास्तविक नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। वे केवल एक आध्यात्मिक संत नहीं, बल्कि एक प्रखर दार्शनिक, समाज-सुधारक और युवाओं को आत्मबल से जोड़ने वाले चिंतक थे। स्वामी विवेकानंद की विचारधारा का मूल उद्देश्य मनुष्य को उसके भीतर निहित शक्ति का जागरण कराना था, क्योंकि उनका विश्वास था कि हर व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास, नैतिकता और करुणा के बीज पहले से मौजूद होते हैं, बस उन्हें जगाने और सही दिशा देने वाले की आवश्यकता होती है। वे जीवन को केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि उसे समाज और समस्त मानवता से जोड़कर देखते थे। 1893 में उन्होंने अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। अपने ऐतिहासिक संबोधन की शुरुआत उन्होंने अमेरिका के भाईयों और बहनों जैसे आत्मीय शब्दों से की, जिसने पूरे सभागार को भावनात्मक रूप से जोड़ दिया। यह केवल एक भाषण नहीं, बल्कि मानव-एकता और सार्वभौमिक भाईचारे का सशक्त संदेश था। आज के समय में, जब दुनिया वैचारिक टकराव, असहिष्णुता और सामाजिक विभाजन से जूझ रही है, विवेकानंद का यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। राष्ट्र की सच्ची उन्नति केवल आर्थिक विकास में नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, नैतिक बल और मानवीय एकजुटता में निहित होती है। स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा बाहर से थोपा जाने वाला ज्ञान नहीं, बल्कि भीतर छिपी हुई शक्ति को पहचानने और जगाने की प्रक्रिया है। उनका मानना था कि कोई भी किसी को सीधे ज्ञान नहीं दे सकता, शिक्षक का कार्य केवल सुप्त चेतना को जगाना होता है। वे यह भी कहते थे कि किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का सही पैमाना यह है कि उस देश में महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। उनका स्पष्ट विचार था कि सबसे पहले महिलाओं को शिक्षित किया जाना चाहिए और उन्हें निर्णय लेने की पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। राष्ट्रीय युवा दिवस 2026 की थीम युवाओं का सशक्तिकरण, विकसित भारत की नींव यह स्पष्ट करती है कि भारत का भविष्य उसकी युवा चेतना में निहित है। एक युवा लेखक और नागरिक के रूप में हमारा दायित्व है कि हम “मैं” से ऊपर उठकर “हम” की भावना अपनाएँ। स्वामी विवेकानंद का अमर संदेश “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए” आज भी उतना ही सार्थक और प्रेरणादायक है। आइए, हम राष्ट्रीय युवा दिवस को केवल मनाने तक सीमित न रखें, बल्कि शिक्षा को आत्मबोध से जोड़ें, नैतिकता को व्यवहार में उतारें और एक सशक्त, मानवीय भारत का निर्माण करें।
जय हिंद! 🇮🇳
जय भारत! 🇮🇳
नोट: यह लेख लेखिका के निजी विचार हैं।








