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April 5, 2026 11:23 pm

“लालच की कोई सीमा नहीं होती” — यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि मानव स्वभाव की एक गहरी सच्चाई है, जो हर युग, हर समाज और हर व्यक्ति पर किसी न किसी रूप में लागू होती है।


मकान। लेकिन जैसे ही इन जरूरतों की पूर्ति हो जाती है, इच्छाओं का विस्तार शुरू हो जाता है। यह विस्तार धीरे-धीरे लालच का रूप ले लेता है। शुरुआत में इंसान थोड़ा और पाने की चाह रखता है, फिर वह “थोड़ा” कब “बहुत ज्यादा” में बदल जाता है, उसे खुद भी पता नहीं चलता।
लालच की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह कभी संतुष्ट नहीं होता। अगर किसी को धन चाहिए, तो वह धन मिलने के बाद और अधिक धन चाहता है। अगर किसी को पद चाहिए, तो वह पद मिलने के बाद और ऊँचा पद चाहता है। यह अंतहीन दौड़ इंसान को भीतर से अशांत कर देती है। वह बाहर से जितना भी सफल दिखे, अंदर से हमेशा अधूरा और बेचैन रहता है।

लालच केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, अपराध—इन सबकी जड़ में कहीं न कहीं लालच ही होता है। जब कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के अधिकारों का हनन करता है, तो वह समाज में असंतुलन पैदा करता है। धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति व्यवस्था को कमजोर कर देती है और विश्वास की नींव हिल जाती है।
रिश्तों में भी लालच एक जहर की तरह काम करता है। जब रिश्ते स्वार्थ पर आधारित हो जाते हैं, तो उनमें सच्चाई और अपनापन खत्म हो जाता है। लोग एक-दूसरे को साधन की तरह देखने लगते हैं, न कि एक इंसान के रूप में। ऐसे रिश्ते ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते और अंततः टूट जाते हैं।

इतिहास और जीवन के अनुभव हमें बार-बार यह सिखाते हैं कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है। जो व्यक्ति अपनी सीमाओं को समझता है और जो मिला है उसमें संतुष्टि महसूस करता है, वही सच्चे अर्थों में सुखी होता है। वहीं जो हमेशा और अधिक पाने की चाह में लगा रहता है, वह कभी सुकून नहीं पा सकता।
इसलिए जरूरी है कि हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें और यह समझें कि हर चीज की एक सीमा होती है। अगर हम उस सीमा को पार करते हैं, तो उसका परिणाम अक्सर नकारात्मक ही होता है।

अंत में यही कहा जा सकता है—

लालच इंसान को कभी भरता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उसे अंदर से खाली कर देता है।

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