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March 29, 2026 5:08 pm

विकास बनाम धर्म की राजनीति, चुनावी मुद्दों से भटकता लोकतंत्र।

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पीछे – नारे और भावनाएं आगे, जनता जवाब तलाश रही है

सतनाम सिंह पाकुड़।  सतनाम सिंह पाकुड़।

भारत जैसे विविधता भरे देश में जहां अलग-अलग धर्म, जातियां और संस्कृतियां साथ रहती हैं, वहां राजनीति का केंद्र बिंदु विकास होना चाहिए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि चुनावों में विकास के बजाय धर्म और भावनाओं को ज्यादा अहमियत दी जाती है। यही कारण है कि असली मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं और जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करती नजर आती है। देश की राजनीति में लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि विभिन्न दलों ने धर्म और जाति के आधार पर समाज को बांटने का काम किया है। चुनावी मंचों पर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन योजनाएं लागू होने के बाद उनकी समीक्षा और जवाबदेही से बचा जाता है। कई बार फैसले जल्दबाजी में लिए जाते हैं, जिनका असर बाद में देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर देखने को मिलता है। नोटबंदी और लॉकडाउन जैसे फैसलों को लेकर आज भी बहस जारी है। इन कदमों के उद्देश्य भले बड़े रहे हों, लेकिन इनके परिणामों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अर्थव्यवस्था पर दबाव, बेरोजगारी और छोटे कारोबारियों की मुश्किलें आज भी चर्चा का विषय हैं। साथ ही, देश में बड़े पैमाने पर चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए भारी निवेश की जरूरत ने भी आर्थिक संतुलन को प्रभावित किया है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में सुधार भी देखने को मिला है। सड़कों और बुनियादी ढांचे में पहले के मुकाबले बेहतर स्थिति नजर आती है। लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अब भी देश पिछड़ा हुआ है। सरकारी अस्पतालों की स्थिति, स्कूलों की गुणवत्ता और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं आज भी कई राज्यों में गंभीर समस्या बनी हुई हैं। भ्रष्टाचार भी एक बड़ी चुनौती है। आम धारणा यह है कि सिस्टम में पैसा नीचे से ऊपर तक सीमित रह जाता है और आम जनता तक उसका लाभ पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। काले धन पर रोक लगाने के प्रयास किए गए, लेकिन उनकी सफलता पर सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद देश की सुरक्षा को लेकर जनता का विश्वास अपनी सेना पर अटूट है। सेना को देश की असली ताकत और सुरक्षा की दीवार माना जाता है। आखिरकार, यह स्पष्ट है कि देश को आगे बढ़ाने के लिए राजनीति में पारदर्शिता, ईमानदारी और विकास केंद्रित सोच की जरूरत है। जनता अब सिर्फ नारों से नहीं, बल्कि ठोस काम और परिणाम चाहती है। अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान दिया जाए, तो भारत फिर से विश्व में एक मजबूत और विकसित राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बना सकता है।

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