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March 14, 2026 11:53 am

पाकुड़ सदर अस्पताल में लापरवाही:
रक्तदान ज़िंदगी बचाता है, लेकिन यहाँ जान बचाने की इच्छाशक्ति ही नहीं!

सदर अस्पताल पाकुड़ में इलाज या लापरवाही? गरीब मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कब रुकेगा?

पाकुड़: रक्तदान को जीवनदान मानने वाले पाकुड़ के डीसी मनीष कुमार ने हाल ही में एक ही दिन में 150 यूनिट रक्त इकट्ठा कर समाज के सामने एक प्रेरणास्पद उदाहरण प्रस्तुत किया। लेकिन इसी जिले के सदर अस्पताल सोना जोड़ी में इलाज की व्यवस्था की हकीकत कुछ और ही बयां करती है।मामला एक भर्ती मरीज की है जो विशनपुर, बरहरवा (साहिबगंज) निवासी आनंद राम का है, जिसे 15 जून को गंभीर स्थिति में सोनाजोड़ी सदर अस्पताल लाया गया।हीमोग्लोबिन मात्र 6.3% होने के कारण तत्काल ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता थी। मरीज के पास उसका छोटा भाई ही था, कोई और सहयोगी नहीं। उनके पड़ोसी नबीनगर उच्च विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक शमशेर आलम (एक पड़ोसी होने के नाते) के द्वारा उसे अस्पताल में भर्ती कर ब्लड बैंक से रक्त लाकर भी दिया गया, लेकिन ब्लड 5 घंटे तक नहीं चढ़ाया गया। आखिरकार एक स्थानीय पत्रकार के प्रयास से शाम 4:55 बजे रक्त चढ़ाना शुरू हुआ।अगले दिन, 16 जून को सुबह से दोपहर 12 बजे तक कोई डॉक्टर मेल वार्ड 21 में राउंड लेने नहीं आया। जब सिविल सर्जन से संपर्क किया गया, तो उन्होंने मरीज की स्थिति देखने के बजाय, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया और अन्य डॉक्टर से संपर्क की सलाह दी। क्या सिविल सर्जन का यही कर्तव्य होता है?और सबसे शर्मनाक बात यह है कि सदर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड टेक्नीशियन सिर्फ रविवार को आता है। पूरे जिले के सबसे बड़े अस्पताल में ऐसी बदहाल व्यवस्था से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आम और गरीब मरीजों का भविष्य क्या है।16 जून तक दो यूनिट ब्लड चढ़ाया गया, जिससे मरीज का हीमोग्लोबिन 7.1% हुआ। अल्ट्रासाउंड में लिवर में इंफेक्शन पाया गया, लेकिन अस्पताल ने इलाज के बजाय “घर ले जाइए” कहकर हाथ खड़े कर दिए।

प्रश्न उठता है —

क्या सदर अस्पताल मरीजों को रेफर करने की मशीन बन चुका है?ब्लड बैंक की पहल और डिप्टी कमिश्नर की कोशिशें क्या ऐसी लापरवाह व्यवस्था में खो जाएंगी?क्या सरकारी डॉक्टरों की जवाबदेही तय होगी?डॉक्टरों को “भगवान का रूप” कहा जाता है, लेकिन अगर भगवान भी उदासीन हो जाए, तो आम जनता की उम्मीद कहां टिकेगी?”अगर आपकी जिंदगी दूसरों की सेवा के लिए नहीं है, तो डॉक्टर बनने का कोई औचित्य नहीं।”

अब ज़रूरत है:

अस्पताल प्रबंधन में जवाबदेही की।हर शिफ्ट में डॉक्टरों की उपस्थिति और राउंड का स्पष्ट बोर्ड डिस्प्ले की।नियमित अल्ट्रासाउंड और अन्य जांच सुविधाएं की।गरीब मरीजों के इलाज में मानवीय संवेदना की।

पाकुड़ जिला प्रशासन से लोगों की अपेक्षा:

सदर अस्पताल में डॉक्टरों की उपस्थिति की निगरानी हो।सभी प्रमुख जाँच सेवाएं, विशेषकर अल्ट्रासाउंड, सप्ताह के हर दिन उपलब्ध हों।मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवहार को प्राथमिकता दी जाए।अस्पताल की कार्यशैली में पारदर्शिता और जवाबदेही लाई जाए।

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