ट्रांसपोर्टर कोल ब्लॉक कंपनी के अधीन है इसलिए यह संभव नहीं की ट्रांसपोर्टर खुद ओवर लोड करते हों,कहीं न कहीं कोल कंपनी की रजामंदी से ही यह ओवर लोड परिवहन संभव है
अवैध तो अवैध है चाहे वो साइकिल,मोटरसाइकिल से कोयला ढोने वाला हो या कोल कंपनी जो कोयले का ओवर लोड परिवहन करवाती है,वो भी अंडर लोड माइनिंग चालान से।
बजरंग पंडित पाकुड़।
पाकुड़ जिले के अमरापाडा में दो कोल ब्लॉक कंपनी स्थित है,एक डब्ल्यूबीपीडीसीएल जिसकी सहयोगी बीजीआर है और दूसरी पीएसपीसीएल जिसकी सहयोगी डीबीएल कोल कंपनी,इन दोनो कंपनी के द्वारा कोयला का ओवर लोड परिवहन निरंतर जारी है,ऐसा दिखता प्रतीत होता हैं की पाकुड़ जिला प्रशासन ने कोल ब्लॉक कंपनी को खुली छूट दे रखी है,इसलिए कोल कंपनी मनमानी भीं करते आ रहे है।कोयले का ओवर लोड परिवहन हाइवा के माध्यम और फिर कोयला का ओवर लोड रेल मालगाड़ी के माध्यम से हर तरफ कोल कंपनी अवैध ही कर रही है,पर्दाफाश तो रेल हावड़ा विजिलेंस ने रेल मालगाड़ी में कोयला ओवर लोड पकड़ और लगभग चालीस लाख का जुर्माना लगा कर किया,हालांकि जुर्माना काफी छोटा है लेकिन इंसान के आंख तो खुली की कैसे दिन दिहाड़े कोल कंपनी सरकार के राजस्व की चोरी कर रही है,राजस्व की चोरी होगी तो जरूर डीएमएफडी, सीसीआर फंड की भी चोरी होगी जो खनन छेत्र में पड़ने वाले ग्रामीण गांव की भलाई के लिए बनाया गया फंड है।

एक तरफ पाकुड़ जिला प्रशासन ने पत्थर के ओवर लोड को लेकर पूरे पाकुड़ जिले भर में चेक नाका स्थापित कर दिया है,पत्थर के ओवर लोड और बिना माइनिंग चालान के परिवहन पर पूरा अंकुश लगा दिया है जिला प्रशासन का वाकई काबिले तारीफ कदम है।जिला टास्क फोर्स ने तो पूरे पाकुड़ जिले में पत्थर में होने वालें अवैध कार्य को लगभग समाप्त ही कर दिया है, अवैध नाम की चीज को उखाड़ कर फेंक ही दिया गया है पत्थर से टास्क फोर्स के द्वारा।

लेकिन कोयला ???
कोयले पर लगाम लगाने में क्यों विफल है टास्क फोर्स।
डब्ल्यूबीपीडीसीएल-बीजीआर,पीएसपीसीएल- डीबीएल के द्वारा पॉल्यूशन,एनजीटी के नियम को ताक पर रख कर बिना त्रिपाल का कोयला का परिवहन में कर रही है, अमरापाड़ा से पाकुड़ खुले में कोयला का परिवहन कर इंसानों की जिंदगी के साथ खेल रही है कोल कंपनी,कभी कदार स्वास्थ शिविर आयोजित किया जाता है तो वो भी अमरापाडा में,जबकि बीमार कोयला लोडिंग पॉइंट से लेकर अनलोडिंग पॉइंट तक के लोग हो रहे है,लेकिन किसी ने गौर करना मुनासिब नहीं समझा आज तक।









