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March 3, 2026 3:06 pm

मशरूम की खेती से बदली तस्वीर, विश्वनाथ हांसदा बने आत्मनिर्भरता की मिसाल।

पाकुड़। परंपरागत खेती से आगे बढ़कर वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने से किसानों की आमदनी किस तरह बढ़ सकती है, इसका जीवंत उदाहरण पाकुड़िया प्रखंड के ग्राम पत्थरडांगा निवासी श्री विश्वनाथ हांसदा पेश कर रहे हैं। मशरूम की खेती अपनाकर उन्होंने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की है, बल्कि गांव में रहकर स्थायी रोजगार का रास्ता भी बनाया है। पूर्व में श्री हांसदा पारंपरिक खेती पर निर्भर थे, जिससे सीमित आय के कारण उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था। इसी दौरान उन्हें उद्यान विभाग द्वारा आयोजित मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण में भाग लेने का अवसर मिला। प्रशिक्षण के बाद विभाग की ओर से आवश्यक स्पॉन/कीट उपलब्ध कराए गए, जिसके बाद उन्होंने मशरूम की खेती की शुरुआत की। आज मशरूम उत्पादन से श्री हांसदा को प्रति माह 12 से 15 हजार रुपये की नियमित आमदनी हो रही है। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। उन्होंने बताया कि पहले ऑफ-सीजन में रोज़गार की तलाश में गांव से बाहर पलायन करना पड़ता था, जबकि अब गांव में ही रोजगार उपलब्ध हो गया है। श्री हांसदा की सफलता से प्रेरित होकर उनके गांव के अन्य किसान भी मशरूम की खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। वे भविष्य में उद्यान विभाग के सहयोग से बृहद स्तर पर मशरूम उत्पादन करने की योजना बना रहे हैं। यह सफलता कहानी स्पष्ट करती है कि सरकारी प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग के माध्यम से किसान कम लागत में बेहतर आय अर्जित कर सकते हैं। मशरूम की खेती जैसे नवाचार न केवल किसानों की आमदनी बढ़ा रहे हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता और पलायन पर रोक लगाने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

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