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January 26, 2026 6:28 pm

पाकुड़ रथयात्रा: 328 साल पुरानी परंपरा का गवाह, कभी कंचनगढ़ से शुरू हुआ उत्सव, आज भी राजशाही गरिमा से होता है आयोजन।

राजकुमार भगत

झारखंड के पाकुड़ जिले की पहचान न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत से है, बल्कि यहां की ऐतिहासिक रथयात्रा और मेला भी इसकी गहरी परंपराओं का प्रमाण है। करीब 328 साल पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा, शाही ठाठ और लोक आस्था के साथ मनाई जाती है, जैसा इसकी शुरुआत में हुआ था।

1697 में राजा पितृ चंद्र शाही ने की थी रथयात्रा की शुरुआत

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 1697 ई. में पाकुड़ के तत्कालीन प्रथम राजा पितृ चंद्र शाही ने कंचनगढ़ से रथयात्रा की शुरुआत की थी। यह आयोजन भगवान मदन मोहन के सम्मान में प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को किया जाता रहा है। उस समय कंचनगढ़ ही पाकुड़ स्टेट का केन्द्र था, जहां आज भी ऐतिहासिक खंडहर मौजूद हैं।

रथयात्रा बनी जनसंस्कृति का हिस्सा

कहा जाता है कि 1760 में मुग़ल बादशाह अकबर ने पाकुड़ को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया। इसके बाद आदिम जनजातीय पहाड़िया समाज की सक्रिय भागीदारी के साथ रथयात्रा व्यापक स्तर पर मनाई जाने लगी। कंचनगढ़ के पहाड़िया राजा के साथ इसका ऐतिहासिक जुड़ाव है।

मोहनपुर से पाकुड़ तक की ऐतिहासिक यात्रा

1802 में पहाड़िया विद्रोह के चलते राजा सितेश चंद्र शाही ने 1815 में राजधानी को मोहनपुर स्थानांतरित किया, जहाँ नीम की लकड़ी से रथ बनाकर यात्रा निकाली जाती थी।
1826 में तृतीय राजा गोपीनाथ पांडे ने पाकुड़ को राजधानी बनाते हुए रथयात्रा को नई भव्यता दी। रथ यात्रा रजवाड़ी से चलकर आज के रानी ज्योतिर्मय स्टेडियम (तब की मौसी बड़ी) तक जाती थी।

1921: राजशाही रिवाज से होती थी पूजा, 1931 में बना पीतल का रथ

चतुर्थ राजा कुमार कालिदास पांडे के शासन में 1921 से रथयात्रा पूरी तरह राजशाही रीति-रिवाजों से संचालित होती थी। 1931 में रानी ज्योतिर्मय देवी ने एक भव्य पीतल का रथ बनवाया, जिसकी ऊंचाई करीब 20 फीट थी और जिसमें चारों ओर पीतल की मूर्तियां लगी थीं। दुर्भाग्यवश, रथ के दो कीमती पीतल के घोड़े आज तक चोरी के बाद नहीं मिल पाए हैं।

आज भी जीवित है परंपरा, राज परिवार निभा रहा भूमिका

आज भी राजापाड़ा स्थित रजवाड़ी मंदिर में भगवान मदन मोहन एवं राधा रानी की विधिवत पूजा होती है, जिसमें राज परिवार के वंशज नियमित भाग लेते हैं। रथयात्रा के दिन भगवान मदन मोहन, रुक्मिणी एवं माता सुभद्रा की विशेष पूजा के बाद उन्हें पालकी में बिठाकर सुसज्जित रथ पर लाया जाता है।
शाम 4 बजे रथ यात्रा हाट पाड़ा, थानापाड़ा, भगतपाड़ा होते हुए कालीबाड़ी मंदिर (मौसी बड़ी) पहुंचती है। यहां भगवान 8 दिन तक विश्राम करते हैं, इसके बाद पुनः रजवाड़ी मंदिर में वापसी होती है।

छोटी रजवाड़ी में सजता है विशाल मेला

रथयात्रा के साथ-साथ छोटी रजवाड़ी के मैदान में हर वर्ष भव्य मेले का आयोजन होता है, जहां सांस्कृतिक कार्यक्रम, झूले, स्थानीय हस्तशिल्प और परंपरागत व्यंजनों की रौनक देखते ही बनती है।

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