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January 26, 2026 8:33 am

हुल दिवस की गूंज, आदिवासी अस्मिता और संघर्ष का गूंजता संदेश।

प्रशांत मंडल

लिट्टीपाड़ा (पाकुड़), ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 1855 में सिदो और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में हुए संथाल विद्रोह की 170वीं वर्षगांठ के अवसर पर लिट्टीपाड़ा प्रखंड ने एक बार फिर इतिहास को जीवंत कर दिया। हुल दिवस पर आयोजित भव्य समारोह में आदिवासी समुदायों ने अपनी एकजुटता, संस्कृति और संघर्ष की भावना को पूरे गौरव के साथ अभिव्यक्त किया।
ग्राम स्वशासन अभियान के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में 350 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों और विभिन्न पंचायतों के प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी रही। कार्यक्रम की शुरुआत वीर शहीद सिदो-कान्हू मुर्मू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। समारोह में पंचायत समन्वयकों, ग्राम प्रमुखों और सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों ने अपने ओजस्वी वक्तव्यों के माध्यम से हुल आंदोलन के ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान सामाजिक संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। वक्ताओं ने बताया कि हुल केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह आज भी आदिवासी अस्मिता, आत्मनिर्भरता और अधिकारों की आवाज है।कार्यक्रम की सबसे आकर्षक झलक रही पारंपरिक संथाली संस्कृति की जीवंत प्रस्तुति। ग्रामीणों ने पारंपरिक पोशाकों में सज-धजकर संथाली गीतों, लोक कविताओं और नृत्यों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं। प्रस्तुतियों में “जल, जंगल और ज़मीन” के संरक्षण, सांस्कृतिक पहचान और आत्मगौरव का संदेश पूरी शिद्दत के साथ उभरा। समारोह का समापन एक संकल्प-शपथ के साथ हुआ, जिसमें सभी प्रतिभागियों ने समानता, सामाजिक न्याय और आत्मशासन के मूल्यों को बनाए रखने का संकल्प लिया। यह आयोजन इस बात का स्पष्ट संदेश था कि हुल क्रांति केवल इतिहास की बात नहीं, बल्कि यह आज भी जीवंत है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

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