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January 23, 2026 6:47 pm

पाकुड़ का पान: चूना, कत्था और सुपाड़ी के बीच दबा सच

पाकुड़: पाकुड़ का पान यूं ही बदनाम नहीं है। यहां पान केवल स्वाद का विषय नहीं, बल्कि सत्ता, प्रशासन और तंत्र की कार्यप्रणाली का प्रतीक बन चुका है। चालान में चूना, सत्ता का कत्था और सुपाड़ी के खेल को लेकर जिले में लंबे समय से चर्चाएं आम हैं। नो-एंट्री और इंट्री के नाम पर होने वाले खेल से आम लोग अनजान नहीं हैं। जनता मूर्ख नहीं है, सब समझती है।पचुवाड़ा क्षेत्र में पेनम परियोजना से जुड़े मामलों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। अरबों रुपये के कथित नुकसान, खादी पहनकर लाभ उठाने और प्रशासन की भूमिका पर उंगली उठती रही है। यहां पत्ता कौन है और कत्था कौन खा रहा है, यह किसी से छिपा नहीं।काले डंपरों की आवाज़ें पाकुड़ में नई नहीं हैं। खनन और परिवहन से जुड़ा सुपाड़ी का खेल लंबे समय से चर्चा में है। सब जानते हैं, पर मानो सब कुछ जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है।बालू कारोबार की बात करें तो चालान कहीं और का, पत्ता कहीं और का और कत्था सत्ता का बताया जाता है। शासन की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा पसरा रहता है।कार्यालयी व्यवस्था भी आरोपों से अछूती नहीं है। पूजा, रजनी के बाद मानवेन्द्र जैसे मामलों में चेक भुगतान, कंप्यूटर ऑपरेटर, केरानी और विभागीय स्तर पर कथित सांठगांठ की चर्चाएं आम हैं। यह सब फाइलों में दर्ज है या नहीं, यह अलग सवाल है, लेकिन जनचर्चा में जरूर है।लकड़ी, लॉटरी और नशे के बढ़ते कारोबार ने पाकुड़ को एक अलग ही पहचान दी है। विकास के नाम पर आधा हिस्सा कहीं और चले जाने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। खतियानी व्यवस्था पर बहस जारी है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे अलग नजर आती है।यह रचना सवाल उठाती है—क्या पाकुड़ का पान सिर्फ स्वाद है या सिस्टम का आईना?
जनता सब जानती है, समझती है और याद रखती है।

पाकुड़ का पान
पाकुड़ के पान में
चूना लगा है चालान का,
सत्ता के कत्था में
सुपाड़ी करोड़ों की।
नो-एंट्री और एंट्री का खेल
सब जानते हैं।
हम मूर्ख नहीं,
मताल हैं—मानते हैं।
पचुवाड़ा के पान में
पेनम ने लगाया अरबों का चूना,
खादी खाया कत्था,
प्रशासन बना पत्ता।
काले डंफरों में
सुपाड़ी का खेल
सब जानते हैं।
हम मूर्ख नहीं,
मताल हैं—मानते हैं।
अजय के बालू में
बिहार का चालान,
पाकुड़ का पत्ता,
सत्ता का कत्था,
शासन की सुपाड़ी—
इस खेल को
सब जानते हैं।
हम मूर्ख नहीं,
मताल हैं—मानते हैं।
पूजा, रजनी के बाद
मानवेन्द्र ने भी
चेक में लगाया चूना,
कंप्यूटर ऑपरेटर पत्ता,
केरानी कत्था,
विभागीय सुपाड़ी—
सब जानते हैं।
हम मूर्ख नहीं,
मताल हैं—मानते हैं।
लकड़ी, लॉटरी और ड्रग से
बन रहा पाकुड़ का मीठा पान,
विकास के नाम पर
पचास प्रतिशत का जर्दा।
खतियानी नहीं खाते पान-वान,
महुआ है महान।
पान नहीं तो
झारखंड में दम नहीं—
सब जानते हैं।
हम मूर्ख नहीं,
मताल हैं—मानते हैं।

दरअसल यह व्यंग्यात्मक कविता पाकुड़ जिले के हिरणपुर निवासी, मान्यता प्राप्त झारखंड आंदोलनकारी दिगम्बर साहा द्वारा लिखी गई है। उन्होंने आगे कहा कि नव वर्ष के अवसर पर कामना है कि पाकुड़ का पान मीठा हो, लेकिन उसमें चूना न मिले।

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