भागवत कथा उनके लिए है जो जीवन को बदलना चाहते हैं
समाज में शिक्षा और संस्कार बढ़ता हैं तो समाज से अज्ञानता मिटता है।
सुधीर सिन्हा
जमुआ,गिरिडीह।
शिक्षा और संस्कार के बिना मनुष्य का निर्माण नहीं हो सकता,उक्त बातें राष्ट्रीय कथा वाचिका देवी हेमलता शास्त्री (मथुरा वृंदावन)ने जमुआ प्रखंड के हरला ग्राम में आयोजित बसरिया धाम में श्री श्री 1008 (9 )दिवसीय शतचंडी महायज्ञ शिव प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान के दौरान कही। उन्होंने कहा कि भागवत कथा उनके लिए है जो जीवन को बदलना चाहते हैं । कहा कि समाज में शिक्षा और संस्कार बढ़ता हैं तो समाज से अज्ञानता मिटता है।
देवी हेमलता शास्त्री जी ने कहा कि धर्म का अर्थ पूजा-पाठ या व्रत-उपवास में लिप्त होना ही नहीं है, बल्कि आचरण में शुद्धि है। जो कर्म समाज में शांति स्थापित करे और किसी को दुखी न करे, वही वास्तविक धर्म है।
हेमलता शास्त्री जी बताती हैं कि किस्मत हाथों की लकीरों से नहीं, बल्कि कर्म और चिंतन से बनती है।
वह प्रेम की भक्ति पर जोर देती हैं, जहाँ भक्त ईश्वर की शरण में रहकर खुद को और दूसरों को प्रेम व संस्कार से जोड़ता है।
उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म से किसी को दुखी न करना और मानवता की भलाई करना है। धर्म वही है जो आत्मा और लोक (समाज) का कल्याण करे, अन्याय के विरोध में खड़ा हो और जिसमें हिंसा, कपट या स्वार्थ न हो।
देवी हेमलता शास्त्री जी ने कहा कि धर्म का अर्थ पूजा-पाठ या व्रत-उपवास में लिप्त होना ही नहीं है, बल्कि आचरण में शुद्धि है। जो कर्म समाज में शांति स्थापित करे और किसी को दुखी न करे, वही वास्तविक धर्म है।
हेमलता शास्त्री जी बताती हैं कि किस्मत हाथों की लकीरों से नहीं, बल्कि कर्म और चिंतन से बनती है।
वह प्रेम की भक्ति पर जोर देती हैं, जहाँ भक्त ईश्वर की शरण में रहकर खुद को और दूसरों को प्रेम व संस्कार से जोड़ता है।
उन्होंने कहा कि भागवत पुराण कथा से लोगों में भक्ति की जागृति आ रही है। उन्होंने बताया कि सनातन धर्म के लिए वह एक दिन भारत माता की कथा कहते हैं। उन्होंने कहा कि बलि प्रथा बिल्कुल बंद होना चाहिए। आज स्थिती यह ,है कि लोग़ अपने स्वार्थ में अंधे हो गए हैं।
हमारे जीवन के लिए मांसाहार की जरूरत नहीं है।मानवता के नाते हम सबों को पशु पक्षी की रक्षा करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म शास्त्रों में ऋषि मुनियों ने बता दिया है की कथाएं उन्हीं बातों को सहज रूप में रखती हैं ,कई बार लोग स्वार्थ में कुछ ऐसा कर देते हैं वैसा नहीं करना चाहिए। जो लोग मांसाहार कर रहे हैं वह ठीक नहीं है।
उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, बल्कि समाज का भी कल्याण होना चाहिए। “धर्म वही है जो आत्मा और लोक – दोनों का उत्थान करे। यदि हमारे कर्मों से किसी का हृदय दुखता है, तो चाहे हम कितनी भी पूजा कर लें, वह अधूरा धर्म है,” उन्होंने कहा कि धर्म का मूल: करुणा, सत्य और सेवा है।
देवी हेमलता शास्त्री ने कहा कि आज के समय में धर्म की सही परिभाषा को समझना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि हिंसा, कपट, स्वार्थ और द्वेष से भरा आचरण कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता। सच्चा धर्म, प्रेम, करुणा और सेवा की भावना से जन्म लेता है ,जब हम दूसरों के दुख को अपना समझकर सहायता करते हैं, तभी ईश्वर की सच्ची आराधना होती है। उन्होंने युवाओं से विशेष आग्रह किया कि वे धर्म को केवल परंपरा के रूप में न अपनाएं, बल्कि उसे जीवन-मूल्य के रूप में आत्मसात करें ।सत्य, संयम, सहिष्णुता और सेवा ये चार स्तंभ ही धर्म की वास्तविक पहचान हैं। अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का आह्वान प्रवचन के दौरान उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म का अर्थ कायरता नहीं है यदि समाज में अन्याय, शोषण या अधर्म हो रहा हो, तो उसके विरुद्ध आवाज उठाना भी धर्म का ही अंग है। जो अन्याय को सहता है, वह भी अधर्म में सहभागी बन जाता है। धर्म हमें सत्य और न्याय के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है, उन्होंने कहा कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है। देवी हेमलता शास्त्री ने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में सत्य और करुणा को अपनाए, तो समाज में स्वतः सकारात्मक परिवर्तन आएगा। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने परिवार और समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दें तथा परस्पर प्रेम और भाईचारे की भावना को मजबूत करें।










