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February 18, 2026 4:08 am

निकाय चुनाव गैर-दलीय, पर राजनीति पूरी सक्रिय, सत्तारूढ़ गठबंधन में तालमेल की कमी, कार्यकर्ता दो खेमों में बंटे।

राजकुमार भगत

पाकुड़। भले ही झारखंड में निकाय चुनाव गैर-दलीय आधार पर हो रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। राजनीतिक दल पूरी तरह सक्रिय हैं और अपने-अपने समर्थित प्रत्याशियों के लिए खुलकर रणनीति बना रहे हैं। कार्यालयों में बैठकों का दौर चल रहा है, जनसंपर्क तेज है और मतदाताओं से समर्थन जुटाने की होड़ लगी है।

गठबंधन में तालमेल कमजोर, अलग-अलग रणनीति।

सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल दलों के बीच अपेक्षित समन्वय का अभाव साफ दिख रहा है। नतीजतन, कई जगह एक ही पार्टी या गठबंधन के अलग-अलग घटक दलों के समर्थित उम्मीदवार आमने-सामने हैं। हर दल अपने कार्यालय में अलग बैठक कर “चिन्हित चेहरे” को आगे बढ़ा रहा है, जिससे गठबंधन की डोर ढीली पड़ती नजर आ रही है।

एक मोहल्ला, कई दावेदार

कई वार्डों में स्थिति यह है कि एक ही मोहल्ले में एक ही पार्टी या गठबंधन के अलग-अलग प्रत्याशी समर्थन मांगते दिख रहे हैं। इससे मुकाबला दिलचस्प जरूर हुआ है, लेकिन कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में भ्रम की स्थिति भी बढ़ी है।

कार्यकर्ता असमंजस में, मनोबल पर असर।

स्पष्ट दिशा-निर्देश के अभाव में कार्यकर्ता दो खेमों में बंट गए हैं। अपने-अपने पसंदीदा उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार तो हो रहा है, पर समन्वय की कमी से संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

नेताओं की दलील बनाम विशेषज्ञों की अपनी राय।

नेताओं का कहना है कि निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि पर आधारित होते हैं। वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा असंतुलन भविष्य के बड़े चुनावों में सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए चुनौती बन सकता है।

सवाल जनता का।

मतदाताओं के बीच सवाल गूंज रहा है—जब राज्य स्तर पर गठबंधन कायम है, तो स्थानीय स्तर पर वही एकजुटता क्यों नहीं दिख रही? निकाय चुनाव में गैर-दलीय ढांचा भले हो, पर राजनीति की सक्रियता और तालमेल की कमी इस चुनाव को निर्णायक मोड़ की ओर ले जाती दिख रही है।

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