अक्षय कुमार सिंह
कुजू। रामगढ़ जिला के कुजू थाना अंतर्गत शिक्षा के क्षेत्र में अपनी कलम के संघर्ष से जीवन मे सफलता तक अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित करने वाले कलम के सिपाही “रंजीत कुमार सिंह” का जन्म गणतंत्र दिवस के अवसर पर 26 जनवरी 1973 में बिहार राज्य के औरंगाबाद जिला के बिहटा गांव में हुआ।

इनके दादा दुःखभंजन सिंह सरकारी शिक्षक हुआ करते थे। इनके पिता मंगल सिंह भी अपने पिता के कदमों पर चलते हुए सरकारी शिक्षक के रूप में विद्यार्थियों की सेवा कर रहे थे। श्री सिंह के माता का नाम लालती देवी था। इनके खानदान के अधिकांश सदस्य सरकारी शिक्षक के रूप में सेवा देते आ रहे थे। देखा जाए तो शिक्षा के क्षेत्र से विशेष जुड़ाव इन्होंने अपने बचपन अथवा बाल्यावस्था में ही महसूस कर लिया था। अपनी प्रारंभिक शिक्षा के दौरान इनका गणित विषय से विशेष प्रेम रहा। इन्होंने 1987 में दसवीं पथरौरा (देवहरा) उच्च विद्यालय से और 1989 सच्चिदानंद सिन्हा कॉलेज, औरंगाबाद से इंटरमीडिएट विज्ञान से पूरा किया। स्नातक उन्होंने गणित से 1992 में लोकप्रिय अनुग्रह मेमोरियल कॉलेज, गया से किया। इनकी मास्टर की डिग्री मगध विश्वद्यालय, बोधगया से रही। शिक्षा में कार्य करने हेतु आवश्यक डिग्री बीएड की पढ़ाई बैंगलोर विश्विद्यालय से पूरी हुई।

पहले खुद को शिक्षित फिर विद्यार्थियों को शिक्षित करना इनका एक मुख्य आदर्श रहा। विद्यार्थी जीवन मे इन्होंने करीब दर्जनों नाटक में जैसे कि शकुंतला , कुणाल की आँखें, सम्राट अशोक, रक्षाबंधन, जयद्रथ वध, कंश वध, लंका पति रावण में इन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का अभिनय कर नाटक के मंच पर अपना लोहा बनवाया।

अगर खेलकूद की बात करें तो इन्हें फुटबॉल खेल से विशेष प्रेम रहा अपने विद्यार्थी जीवन सहित युवावस्था में इन्होंने कई खेल के मैदानों में फुटबॉल खेल में अपने हुनर का प्रदर्शन किया। इस खेल में इन्होंने क्षेत्रीय एवं जिला स्तर पर कई टूर्नामेंट में हिस्सा लिया।

एक शिक्षक के रूप में इन्होंने अपने विवाह के उपरांत जनवरी 1997 में मौजूदा झारखंड के रामगढ़ जिला अंतर्गत कुजू में कदम रखा। प्रारंभिक दिनों में इन्होंने एक ट्यूशन एवं कोचिंग शिक्षक के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखे हुए एक शिक्षक के आदर्शों को अपना लिया। बहुत जल्द उनकी शिक्षण शैली से अभिभावक एवं विद्यार्थी आकर्षित हुए और बच्चों ने उनके शिक्षण शैली का अनुकरण करते हुए गणित को अपना प्रमुख विषय बना लिया। आज सैकड़ो बच्चे श्री सिंह से शिक्षा प्राप्त कर सरकारी एवं गैर सरकारी मुकाम पर भारत सहित झारखंड के कई जिलों में पदस्थापित है। श्री सिंह ने बताया कि एक शिक्षक की सबसे बड़ी पूंजी उसके विद्यार्थी की सफलता होती है एक शिक्षक अपनी विद्यार्थियों के सफलता से ही जाना जाता है।
सन 2010 में बाल विद्या मंदिर आरा कोलियरी में इन्होंने एक गणित शिक्षक के रूप में पदभार संभाला और बहुत जल्द ही विद्यालय में अपने शिक्षण शैली के कारण लोकप्रिय हुए।

26 जनवरी से विशेष लगाव इनका प्रारंभ से ही रहा और 26 जनवरी 2022 के दिन ही ईश्वर के रचित फैसले पर चलकर विद्यालय में एक प्राचार्य के रूप में सेवा देना आरंभ किया। जैसे कि गणतंत्र दिवस इनसे कह रही हो विशेष कर्मठ पुरुष को एक विशेष दिन की पहचान होती है।

श्री सिंह ने अपनी सबसे प्रिय पुस्तक रामायण और अपना आदर्श श्री राम को बताया। अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए यह कहते हैं कि मैं अपनी पैतृक संपत्ति का कभी उपभोग ना करते हुए अपने संघर्ष और अपने कलम के दम पर अपनी जीवन यात्रा जारी रखी है। आज उनकी सभी चारों बाल-बच्चे उच्च शिक्षा में अपना मुकाम बना चुके हैं। इन्होंने अपने बच्चों को संघर्ष के रास्ते पर चलते हुए, मेहनत के हथियार से सफलता रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने की सीख दी है।
जीडी न्यूज़ सलाम करता है ऐसे कलम के सिपाहियों को।






