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March 9, 2026 11:50 pm

आदिवासियों की जमीन और खनिज लूटने वाली कंपनियों के खिलाफ होगा बड़ा आंदोलन, वृंदा करात।

सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो सदस्य ने अमड़ापाड़ा में की जनसुनवाई, कोयला खनन से बर्बाद हो रही खेती और बढ़ते प्रदूषण पर जताई चिंता।

​अमड़ापाड़ा/पाकुड़ – भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की वरिष्ठ नेत्री सह पोलित ब्यूरो सदस्य और पूर्व राज्यसभा सांसद वृंदा करात रविवार को अमड़ापाड़ा पहुँचीं। इस दौरान उन्होंने पचुवाड़ा कोयला खदान प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और जनसुनवाई के माध्यम से स्थानीय आदिवासियों, शोषितों और वंचितों की समस्याएं सुनीं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि विदेशी कंपनियां और कॉर्पोरेट सेक्टर यहाँ की खनिज संपदा पर नजर गड़ाए हुए हैं और रैयतों की जमीन लूटी जा रही है, जिसके खिलाफ अब एक निर्णायक और असरदार आंदोलन शुरू किया जाएगा।

एसपीटी एक्ट के उल्लंघन का लगाया आरोप।

संबोधित करते हुए वृंदा करात ने कहा कि पाकुड़ में निजी कोयला कंपनियां और कॉर्पोरेट घराने खुलेआम संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) का उल्लंघन कर रहे हैं। रैयतों की जमीनें छीनी जा रही हैं और डर का ऐसा माहौल है कि स्थानीय लोग विरोध में मुंह खोलने से भी कतरा रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसानों के हितों और अधिकारों को बुरी तरह कुचला जा रहा है।

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गहराता संकट।

वहीं वृंदा करात ने क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पर्यावरण का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। जमीनें बंजर हो रही हैं और प्रदूषण के कारण हादसों में बढ़ोत्तरी हुई है। उन्होंने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर निशाना साधते हुए कहा कि बोर्ड का काम केवल कागजों तक सीमित रह गया है, जबकि जमीन पर लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। कार्यक्रम के दौरान ‘आदिवासी अधिकार मंच’ की टीम द्वारा प्रभावित इलाकों में किए गए सर्वे की रिपोर्ट पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इस दौरान इम्पैक्ट-सर्वे रिपोर्ट के सिद्धांतों और स्थानीय लोगों को मिल रहे विस्थापन के दर्द को साझा किया गया। उन्होंने बताया कि सीपीआई (एम) इन मुद्दों पर लगातार अभियान चला रही है ताकि शोषितों को उनका हक दिलाया जा सके।

24 मार्च को दिल्ली रैली में शामिल होने का आह्वान।

वृंदा करात ने लोगों से एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि अपनी आवाज बुलंद करने के लिए आगामी 24 मार्च को दिल्ली में आयोजित होने वाली रैली में बड़ी संख्या में शामिल हों। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल जमीन बचाने की नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की है। मौके पर आक्रोश जत्था के सदस्य और भारी संख्या में प्रभावित ग्रामीण उपस्थित थे।

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