लिट्टीपाड़ा के कंचनगढ़ में संचालित हो रहे थे रथ यात्रा
राजकुमार भगत
पाकुड़। झारखंड के बंगाल सीमा पर स्थित पाकुड़ का रथ यात्रा की कथा अति प्राचीन है। यहां रथ यात्रा मुगल काल के शासन से चला रहा है। समय समय पर रथ यात्रा का स्वरूप बदला, किंतु परंपरा आज भी जारी है।
सूत्रों से मिली प्राप्त जानकारी के अनुसार भगवान मदन मोहन रथ यात्रा का इतिहास 1697 से बताई गई है। इसका शुभारंभ पाकुड़ राज के तत्कालीन प्रथम राजा पृथ्वी चंद शाही ने की थी। पाकुड़ राज के कुल देवता भगवान मदन मोहन और रुक्मणी माता जी थीं ।
उसे समय जिले का राज स्टेट लिट्टीपाड़ा प्रखंड का कंचनगढ़ हुआ करता था। बताया जाता है की कंचनगढ़ के रजवाड़ी का खंडहर शेष वजूद आज भी देखे जा सकते हैं। पृथ्वी चंद शाही के पुत्र सितेश चंद्र शाही ने दूसरे राजा के रूप में 1739 में कार्यभार संभाला। बताया जाता है कि अकबर बादशाह ने इसे पूर्ण राज का दर्जा दिया था। तत्पश्चात राज पाट का सुचारू रूप से संचालन होने लगा था।
उसे समय रथ यात्रा में आदिम जनजाति पहाड़िया एवं आदिवासी समुदाय के काफी लोग रात यात्रा में शामिल हुआ करते थे आदिवासी समाज द्वारा विधि पूर्वक पूजा की जाती थी। कंचनगढ़ के राजा पहाड़िया राजा के रूप में जाने जाते थे। 1802 में पहाड़िया समाज द्वारा विद्रोह शुरू हुआ । इस कारण राजा सतीश चंद्र शाही 1815 में कंचनगढ़ से राजपथ उठाकर जिले के हिरणपुर प्रखंड के मोहनपुर में बस गए। पूर्व में रथ नीम के लकड़ी से बना विशाल हुआ करता था । मोहनपुर में रथ यात्रा पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता था। तत्पश्चात पाकुड़ राज्य के तृतीय राजा गोपीनाथ पांडे ने 1826 में कार्यभार संभाला और श्रद्धापूर्वक रथ यात्रा निकला जाने लगा। 1856 में तृतीय राजा पाकुड़ में आकर बस गए। राजा शहर के राजा पाड़ा स्थित रजवाड़ी मैदान में मेले मे का आयोजन किया था और तब से आज तक यह प्रथा जारी है। समय काल परिस्थिति बदला चतुर्थ राजा कुमार कालिदास पांडे ने 1921 में पदभार ग्रहण किया एवं अष्टधातु का रथ का निर्माण करवाया । अब रथ के कुछ कल पुर्जे चोरी हो गए हैं। रथ में पीतल के दो विशाल घोड़ा हुआ करते थे ।जो आज की तिथि में नहीं है। किंतु रथ वही है जिसके अंश आज भी देखे जा सकते हैं। राज परिवार द्वारा बड़े ही रीति रिवाज के साथ पूजा अर्चना कर भगवान मदन मोहन के निवास यात्रा से तब रथ यात्रा प्रारंभ होकर आज की रानी ज्योतिर्मय स्टेडियम में मौसी के घर बनाकर रखा जाता था। जो देश के आजादी के बाद भी स्टेडियम में जहां आज रानी मां का फोटो लगा है वहां एक स्टेज हुआ करता था। उस समय यह मैदान बहुत ही विशाल था।यह बहुत पुरानी बात नहीं है क्योंकि खुद मैंने रथ को वहां देखा है। रथ पीतल का हुआ करता था ।जिसमें आगे की ओर दो पीतल के घोड़े लगे थे। पूरे रथ में नक्काशी हुआ करता था एवं सभी दिशाओं में भगवान की मूर्ति लगाए गए थे। यह सब तो मैं खुद अपनी आंखों से देखा है। आज के रानी ज्योति में स्टेडियम में तब 8 दिनों के लिए रथ रखा जाता था। मदन मोहन का आठ दिनों तक मौसी के घर में पूजा अर्चना किया जाता था और पुनः नौवे दिन रथ पर सवार होकर भगवान मदन मोहन अपने निज धाम के लिए प्रस्थान कर जाते थे । किंतु समय काल परिस्थिति बदला अब रानी ज्योति में स्टेडियम में रथ नहीं जाते हैं ।बल्कि रजवाड़ी से निकलकर पुनः रजवाड़ी मैदान में पहुंचते हैं तथा कालीबाड़ी मंदिर में 8 दिनों तक अपनी मौसी के घर में विश्राम करते हैं और नवें निजधाम के लिए भगवान जगन्नाथ प्रस्थान करते हैं और यह परंपरा आज भी जारी है। रथ के कुछ कल पुर्जे अवश्य नहीं है किंतु रथ आज भी 1921 से वही है।






