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April 12, 2026 5:33 pm

संतुलित उर्वरक उपयोग से बढ़ेगी पैदावार, घटेगी लागत: कृषि विज्ञान केंद्र, रामगढ़

अक्षय कुमार

रामगढ़। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के निदेशक डॉ. अनुप दास के मार्गदर्शन में कृषि विज्ञान केंद्र, रामगढ़ द्वारा कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण (आत्मा) रामगढ़ के सहयोग से “उर्वरकों के संतुलित उपयोग” विषय पर एक जागरूकता कार्यक्रम का सफल आयोजन हुआ।

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सभा में किसानों को संबोधित करते डॉक्टर सुधांशु शेखर

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, उर्वरकों के समुचित उपयोग तथा उत्पादन लागत में कमी के प्रति जागरूक करना था। इस अवसर पर जिले के करीब 40 किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. सुधांशु शेखर, प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र, रामगढ़ ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि मिट्टी की जाँच के बिना उर्वरक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उन्होंने बताया कि मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन अपनाने से फसल उत्पादन में वृद्धि होती है तथा अनावश्यक खर्च से बचा जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संतुलित उर्वरक के उपयोग से अधिक उत्पादन प्राप्त होता है तथा लागत कम होती है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि संभव है। इस अवसर पर संजय मंडल, उप परियोजना निदेशक, आत्मा रामगढ़ ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि उर्वरकों का असंतुलित उपयोग मृदा की उर्वरता को प्रभावित करता है और पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे जैविक एवं रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग करें तथा कम्पोस्ट, हरी खाद एवं जैव उर्वरकों को अपनाएं।

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कार्यक्रम के दौरान किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड, उर्वरकों के 4R सिद्धांत (सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय, सही विधि) तथा मृदा नमूना संग्रहण की विधि की विस्तृत जानकारी दी गई। साथ ही, हरी खाद (ग्रीन मैन्योरिंग) जैसे ढैंचा आदि फसलों के उपयोग से मृदा में जैविक कार्बन बढ़ाने, नाइट्रोजन की उपलब्धता सुधारने तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के बारे में भी जानकारी दी गई। विशेष रूप से धान रोपाई से पूर्व हरी खाद (प्री-राइस ग्रीन मैन्योरिंग) अपनाने पर जोर दिया गया, जिससे नाइट्रोजन की पूर्ति होती है तथा संतुलित उर्वरक उपयोग में अंतर (फर्टिलाइजर गैप) को कम करने में मदद मिलती है। इसके अतिरिक्त, किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग से होने वाले दीर्घकालिक लाभों, जैसे मृदा की संरचना में सुधार, जल धारण क्षमता में वृद्धि तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने के बारे में विस्तार से बताया गया। किसानों ने कार्यक्रम के दौरान अपनी समस्याएँ साझा कीं, जिनका विशेषज्ञों द्वारा समाधान किया गया। अंत में, कृषि विज्ञान केंद्र, रामगढ़ एवं आत्मा रामगढ़ ने किसानों से अपील की कि वे संतुलित उर्वरक उपयोग एवं हरी खाद को अपनाकर मृदा स्वास्थ्य सुधारें, पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करें तथा कृषि को अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ बनाएं।

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