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June 8, 2026 4:49 pm

लोकतंत्र के प्रहरी, लेकिन सुविधाओं से वंचित

हरियाणा से ओडिशा तक पत्रकारों को पेंशन-बीमा का सहारा, झारखंड में अब भी व्यापक कल्याणकारी नीति का इंतजार

सतनाम सिंह पाकुड़।

भारत में पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। सरकार और जनता के बीच सेतु की भूमिका निभाने वाले पत्रकार दिन-रात जोखिम उठाकर सूचनाएं जुटाते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि देश के अधिकांश पत्रकार आज भी सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि कुछ राज्यों ने पत्रकारों के हित में सराहनीय पहल की है, लेकिन कई राज्यों में अब भी पत्रकार कल्याण योजनाएं अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई हैं।
देश में हरियाणा, ओडिशा, असम, गुजरात, तमिलनाडु और पुडुचेरी जैसे राज्यों ने पत्रकारों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। हरियाणा में मान्यता प्राप्त पत्रकारों को पेंशन, समूह बीमा और आर्थिक सहायता जैसी सुविधाएं दी जाती हैं। ओडिशा की गोपबंधु पत्रकार स्वास्थ्य बीमा योजना पत्रकारों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करती है। असम में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता और सेवानिवृत्त पत्रकारों के लिए पेंशन व्यवस्था है। गुजरात में दुर्घटना और मृत्यु की स्थिति में लाखों रुपये तक का बीमा कवर उपलब्ध कराया जाता है, जबकि तमिलनाडु और पुडुचेरी में वरिष्ठ पत्रकारों के लिए पेंशन योजनाएं संचालित हैं। केंद्र सरकार भी पत्रकार कल्याण योजना के माध्यम से गंभीर बीमारी, दुर्घटना, स्थायी विकलांगता अथवा मृत्यु की स्थिति में आर्थिक सहायता प्रदान करती है। इसके अलावा मान्यता प्राप्त पत्रकारों को विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सूचनाओं तक विशेष पहुंच मिलती है। बावजूद इसके, बड़ी संख्या में पत्रकार ऐसे हैं जो इन सुविधाओं के दायरे से बाहर हैं। झारखंड की बात करें तो यहां पत्रकारों के लिए मान्यता व्यवस्था, सीमित पेंशन और कुछ कल्याणकारी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन पत्रकार संगठनों का मानना है कि राज्य में अभी भी व्यापक पत्रकार सुरक्षा कानून, प्रभावी स्वास्थ्य बीमा और मजबूत कल्याणकारी ढांचे की आवश्यकता है। ग्रामीण और प्रखंड स्तर पर कार्यरत पत्रकारों को सबसे अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सीमित संसाधनों में काम करने वाले पत्रकार कई बार दुर्घटना, बीमारी अथवा अन्य आपात परिस्थितियों में आर्थिक संकट से जूझते हैं।
पत्रकारिता केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक जिम्मेदारी है। अपराध, भ्रष्टाचार, प्राकृतिक आपदा, चुनाव और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरों के लिए पत्रकारों को जोखिम भरे हालात में भी काम करना पड़ता है। कई बार उन पर हमले होते हैं, धमकियां मिलती हैं और जान का खतरा भी बना रहता है। इसके बावजूद उनकी सुरक्षा और कल्याण को लेकर ठोस नीतियां अब भी अधूरी हैं।
देशभर के पत्रकार संगठन लंबे समय से पत्रकार सुरक्षा कानून, सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, न्यूनतम पेंशन, आवास सुविधा, बच्चों की शिक्षा सहायता और जिला स्तर पर पत्रकार कल्याण कोष की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिस वर्ग पर लोकतंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही की जिम्मेदारी है, उसे स्वयं असुरक्षा के माहौल में काम नहीं करना चाहिए। आज जब सरकारें विभिन्न वर्गों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं, तब पत्रकारों के लिए भी एक मजबूत और प्रभावी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था समय की मांग बन गई है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब सच को सामने लाने वाले पत्रकार आर्थिक और सामाजिक रूप से सुरक्षित होंगे। सरकारों को चाहिए कि वे पत्रकारों को केवल लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहकर सम्मानित न करें, बल्कि उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य की भी ठोस गारंटी सुनिश्चित करें।

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