राजमहल की भू-विरासत, 11.8 करोड़ साल पुराने जीवाश्म, गंगा पारिस्थितिकी और प्रागैतिहासिक मानव-पर्यावरण संबंधों का होगा अंतरविषयक अध्ययन, साहिबगंज कॉलेज के डॉ. रणजीत कुमार सिंह बने सह-प्रधान अन्वेषक।
साहिबगंज। राजमहल की पहाड़ियों और गंगा नदी क्षेत्र की करोड़ों वर्ष पुरानी भू-विरासत अब वैज्ञानिक अध्ययन के नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। झारखंड विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार परिषद (JCSTI) ने राजमहल-गंगा क्षेत्र की भू-विविधता, जीवाश्म संपदा, जैव विविधता और पुरातात्विक विरासत के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए बहुविषयक शोध परियोजना ‘जियो-राजमहल (GEO-RAJMAHAL)’ को मंजूरी दी है। 36 महीने की इस परियोजना में भूविज्ञान, पारिस्थितिकी और भू-पुरातत्व के विभिन्न पहलुओं का व्यवस्थित अध्ययन किया जाएगा।
परियोजना के प्रधान अन्वेषक आईआईटी (आईएसएम), धनबाद के अनुप्रयुक्त भूविज्ञान विभाग के प्रो. दीपक कुमार झा हैं, जबकि साहिबगंज कॉलेज के भूविज्ञान विभाग के भू-वैज्ञानिक सह पर्यावरणविद् डॉ. रणजीत कुमार सिंह को सह-प्रधान अन्वेषक बनाया गया है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), रांची की वरिष्ठ भूवैज्ञानिक सुश्री श्रेया श्रेय भी परियोजना में महत्वपूर्ण सहयोग करेंगी। साहिबगंज जिले और साहिबगंज कॉलेज के लिए यह विशेष उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि भू-विज्ञान के क्षेत्र में जिले और कॉलेज से जुड़ी यह पहली महत्वपूर्ण शोध परियोजना है। डॉ. रणजीत कुमार सिंह लंबे समय से राजमहल की भूगर्भीय विरासत, पर्यावरण, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक अध्ययन एवं संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। ‘जियो-राजमहल’ के तहत राजमहल पहाड़ियों, गंगा नदी प्रणाली, जीवाश्म स्थलों और जैव विविधता से जुड़े क्षेत्रों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाएगा। परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा क्षेत्र में पाए जाने वाले दुर्लभ क्रिटेशियस युगीन पादप जीवाश्मों का अध्ययन और संरक्षण भी होगा। राजमहल क्षेत्र लगभग 11.8 करोड़ वर्ष पुराने पादप जीवाश्मों और जीवाश्मीकृत लकड़ियों के लिए जाना जाता है। साहिबगंज के मंडरो प्रखंड में जीवाश्मों की प्रचुरता को देखते हुए GSI ने वर्ष 2014 में इसे भू-विरासत स्थल के रूप में मान्यता दी थी। जीवाश्म संरक्षण के उद्देश्य से झारखंड सरकार के वन विभाग ने वर्ष 2022 में यहां फॉसिल पार्क का निर्माण भी कराया। शोध परियोजना के माध्यम से अब तक कम अध्ययन किए गए जीवाश्म क्षेत्रों की पहचान, भूगर्भीय संरचनाओं का अध्ययन और राजमहल की प्राकृतिक विरासत का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया जाएगा। साथ ही यह भी समझने का प्रयास होगा कि क्षेत्र के भूगर्भीय और अन्य अजैविक कारक गंगा पारिस्थितिकी तंत्र तथा जैव विविधता को किस तरह प्रभावित करते हैं। परियोजना में प्रागैतिहासिक काल में क्षेत्र में रहने वाली जनजातियों और उनके पर्यावरण के बीच संबंधों का भी अध्ययन किया जाएगा। इसके जरिए भूविज्ञान, पर्यावरण और मानव इतिहास को एक साथ जोड़कर राजमहल क्षेत्र के अतीत और वर्तमान के बीच वैज्ञानिक संबंध स्थापित करने का प्रयास होगा।
शोध से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर क्षेत्र के संरक्षण और सतत विकास के लिए वैज्ञानिक नीतियां तैयार करने में सरकार को मदद मिल सकती है। इसके अलावा भू-पर्यटन को बढ़ावा देने, स्थानीय समुदाय की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने और दीर्घकालिक रोजगार के अवसर विकसित करने की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा। ‘जियो-राजमहल’ परियोजना से राजमहल की करोड़ों वर्ष पुरानी भू-विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद है। साथ ही यह परियोजना प्राकृतिक संपदा के संरक्षण को स्थानीय विकास और रोजगार से जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।










