1977 में हुई थी महाकाल शक्तिपीठ की स्थापना, 2008 में कमलासन पर विराजमान मां शक्ति के दिव्य स्वरूप की हुई प्राण-प्रतिष्ठा।
राजकुमार भगत
पाकुड़ के तलवाडंगा स्थित महाकाल शक्तिपीठ में मां दुर्गा की 1008 भुजाओं वाली भव्य प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। कमलासन पर विराजमान मां दुर्गा की 17 फीट ऊंची प्रतिमा अपने अनूठे स्वरूप के कारण अलग पहचान रखती है। यहां प्रतिदिन वैदिक रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। राज प्लस टू उच्च विद्यालय के पीछे हीरानंदनपुर पंचायत क्षेत्र में स्थित इस शक्तिपीठ की स्थापना वर्ष 1977 में स्वामी सिद्धार्थ परमहंस महाराज ने स्थानीय लोगों के सहयोग से की थी। शुरुआत में यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित नहीं थी। वर्ष 1998 में भक्तों के आग्रह पर महाराज के नेतृत्व में मां शक्ति की 10 भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित की गई। इसके बाद प्रतिमा के स्वरूप में क्रमशः बदलाव करते हुए 18, 54 और 108 भुजाओं वाली प्रतिमाएं स्थापित की गईं। वर्ष 2008 में मां दुर्गा की 1008 भुजाओं वाली 17 फीट ऊंची प्रतिमा की स्थापना की गई। प्रतिमा की रूपरेखा ओडिशा के मूर्तिकार ने तैयार की थी। इसके बाद से महाकाल शक्तिपीठ मां दुर्गा की अनूठी प्रतिमा के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान बना चुका है।
चार महीनों में होती है विशेष पूजा
महाकाल शक्तिपीठ में माघ, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन मास में मां की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। आश्विन मास में नौ दिनों तक वैदिक विधि-विधान और ज्योतिषीय परंपराओं के अनुसार पूजा होती है। यहां कुमारी पूजन का भी विशेष महत्व है। वर्तमान में स्वामी सिद्धार्थ परमहंस महाराज नियमित रूप से मंदिर नहीं आते हैं, लेकिन मां की पूजा-अर्चना लगातार जारी है।
झारखंड के अलावा बंगाल-बिहार से भी पहुंचते हैं भक्त
महाकाल शक्तिपीठ में मां दुर्गा के दर्शन और आराधना के लिए झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल और बिहार से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्तों की मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने पर उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही आस्था इस शक्तिपीठ को विशिष्ट धार्मिक पहचान देती है।





