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March 19, 2026 5:50 am

विशेष रिपोर्ट: डिग्री का बढ़ता बोझ और घटती इंसानियत — समाज के ‘साहबों’ पर समाज और गरीबो के हित केवल दिखावटी मुखड़ा

विश्लेषण डेस्क आज के आधुनिक दौर में हम चांद पर पहुँचने की तैयारी तो कर रहे हैं, लेकिन ज़मीन पर इंसानियत का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है। हाल ही में समाज के विभिन्न वर्गों के व्यवहार पर एक गहरी चिंता व्यक्त की गई है, जो यह बताती है कि हमारे नाम के आगे लगे “डॉक्टर”, “इंजीनियर” और “अधिकारी” जैसे भारी-भरकम टैग अब केवल डिग्रियाँ बनकर रह गए हैं, सेवा का भाव इनमें से कहीं खो चुका है।


विकास की बलि चढ़ती ईमानदारी


रिपोर्ट के अनुसार, आज के इंजीनियर ऐसी सड़कें बना रहे हैं जो बारिश की पहली बूंद पड़ते ही अपनी ‘कसम’ तोड़ देती हैं। यह तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि नैतिकता की विफलता है। जहाँ विकास होना चाहिए था, वहाँ भ्रष्टाचार और ठेकेदारी का मजाक चल रहा है।


इलाज या व्यापार?


स्वास्थ्य जगत की स्थिति और भी भयावह है। जहाँ डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता था, वहाँ अब ‘फीस और बिल’ मुख्य प्राथमिकता बन गए हैं। बीमारी ठीक हो या न हो, लेकिन अस्पताल के काउंटर पर बिल का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा है। चिकित्सा अब सेवा के बजाय एक मुनाफे वाला व्यवसाय बनकर रह गई है।
कुर्सी का ‘रौब’ और फाइलों का मकड़जाल
सबसे गंभीर प्रहार अधिकारी वर्ग पर किया गया है। सरकारी कार्यालयों में आम जनता के साथ होने वाला व्यवहार किसी राजा-महाराजा के दरबार जैसा प्रतीत होता है।
साधारण काम, असाधारण देरी: एक छोटे से हस्ताक्षर के लिए महीनों फाइलें घुमाई जाती हैं।
संवेदनहीनता: “प्रक्रिया में है” (Process Mein Hai) जैसे शब्द अब टालमटोल का हथियार बन चुके हैं।


भूल गए जनता का हक: अधिकारी यह भूल जाते हैं कि उनकी आलीशान कुर्सियाँ और वेतन उसी आम आदमी के टैक्स से आता है, जिसे वे दफ्तरों के चक्कर लगवाते हैं।
विशेषज्ञों का मत: “डिग्री से नहीं, व्यवहार से पहचानिए”
आज समाज में एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जिसके पास ज्ञान तो है पर विनम्रता नहीं, पद है पर सेवा भाव नहीं। अगर यही स्थिति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब लोग किसी की डिग्री देखकर प्रभावित होने के बजाय सतर्क हो जाएंगे कि— “सावधान! एक और साहब आ गए हैं।”
संपादकीय टिप्पणी:  यह समय आत्म-चिंतन का है। क्या हम केवल साक्षर बन रहे हैं या शिक्षित? शिक्षा का असली पैमाना दीवार पर टंगी फ्रेम वाली डिग्री नहीं, बल्कि वह संवेदनशीलता है जो एक इंसान दूसरे इंसान के प्रति दिखाता है।
क्या आप भी ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं? अपनी राय हमें कमेंट में बताएं।

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