सुदीप कुमार त्रिवेदी
सेवाभाव के बेलवृक्ष अक्सरहाँ मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण भूमि पर ही निकलते हैं, ये बातें अक्षरशः लुतफुल हक पर सटीक बैठती है । कई अवार्ड्स से नवाज़े गए लुतफुल हक की साफगोई का ये आलम है कि मिलने वालों को ये भान तक नहीं हो पाता कि उनके सामने बैठा शख्स ही लुतफुल हक है । उनकी सादगी के बाबत पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरा बचपन ग़रीबी में गुजरा है । इन्होने आगे बताया कि वे अपने पेट के लिए पाकुड़ रेलवे स्टेशन के मंदिरों में रात सोकर गुजारा है । उक्त स्टेशन के पुराने कुली ने इस बाबत पूछने पर बताया कि लुतफुल हक को उन्होंने अपनी आँखों से देखा है। साफगोई से अपनी पुरानी जिंदगी के बाबत समाजसेवी ने बताया कि उनकी मुफ्लिसी के दौर में उनके द्वारा ऐसे त्रुटिपूर्ण कार्य किए गए हैं जिनको बताना उचित नहीं है । उस मुफ्लिसी के दौर से बाहर निकलकर वे आज इस मुकाम में पहुंचा हैं । इस लिए जब भी कोई फरियादी या गरीब अपनी बात लेकर उनके पास आते हैं तो वे उनको खाली हाथ वापस नहीं भेजते हैं । बकौल लुतफुल हक इसलिए उन्होंने रेलवे स्टेशन को चुना है, जहाँ हर तरह के लोग पहुँचते है । लुतफुल हक ने बताया कि तमाम जरूरतमंद लोग भूखे पेट रात में न सोये इस लिए उन्होंने भोजन वितरण का काम शुरू किया गया है । बताते चले कि पिछले चार सौ दिनों से लगातार निःस्वार्थ भावना से रेलवे स्टेशन में निःशुल्क भोजन इनके सौजन्य से चल रहा है





