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May 7, 2026 10:09 pm

पाकुड़ में नशे का काला खेल, ड्रग्स,डेंड्राइट-खैनी के जाल में फंसता बचपन, ‘नशा मुक्ति’ के दावों की खुली पोल

जहरीला नशा बना नौनिहालों की आदत, खुलेआम बिक्री से बढ़ रहा खतरा, प्रशासनिक सख्ती सवालों के घेरे में।

पाकुड़ जिले में जिला प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे नशा मुक्ति अभियानों और धरातल की कड़वी सच्चाई के बीच एक गहरी खाई नजर आ रही है। एक तरफ जहां अधिकारी मंचों से जिला को नशा मुक्त करने की कसमें खा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पाकुड़ की गलियों में मासूम बच्चे न केवल खैनी मलते दिख रहे हैं, बल्कि डेंड्राइट जैसे जानलेवा नशे के जाल में भी फंस चुके हैं।

20 रूपया का ‘सस्ता नशा’ और बर्बाद होता बचपन

जिले के सीतापहाड़ी, नवीनगर, चांदपुर, विक्रमपुर मोड़, हिरणपुर बाजार और डांगापाड़ा जैसे इलाके नशे के अवैध कारोबार के गढ़ बन चुके हैं। यहां महज 20 रुपये में मिलने वाला डेंड्राइट लोशन बच्चों के लिए मौत का सामान साबित हो रहा है। नाबालिग खुलेआम दुकानों से डेंड्राइट खरीदते हैं और एकांत जगहों पर पॉलीथिन के जरिए इसे सूंघकर नशे की दुनिया में खो रहे हैं।

खैनी से लेकर गांजा तक: हर तरफ फैला जाल

सिर्फ डेंड्राइट ही नहीं, पाकुड़ में नाबालिगों के हाथों में तंबाकू (खैनी) और गांजा भी आसानी से पहुंच रहा है। सूत्रों के अनुसार, तारापुर से गांजे की थोक सप्लाई हो रही है, जो छोटी दुकानों के माध्यम से बच्चों तक बेधड़क पहुंचाई जा रही है। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर वायरल होती तस्वीरें प्रशासन के उन दावों पर सवालिया निशान लगाती हैं, जिनमें नशा मुक्ति को प्राथमिकता बताया जाता है।

नशे की लत से बढ़ रहा अपराध

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह नशा न केवल स्वास्थ्य खराब कर रहा है, बल्कि अपराध को भी जन्म दे रहा है। नशे की लत पूरी करने के लिए किशोर और युवा घरों में चोरी, दुकानों में सेंधमारी और बाइक चोरी जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।सीएचसी के चिकित्सा प्रभारी डॉ. सुनील कुमार सिंह के अनुसार, डेंड्राइट सूंघना सीधा सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। इससे मानसिक संतुलन बिगड़ने, ब्रेन डैमेज, डिप्रेशन, और लीवर-किडनी फेल होने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। यह धीमा जहर बच्चों को मौत की ओर धकेल रहा है।विडंबना यह है कि डेंड्राइट के पैकेट पर “इसे सूंघना हानिकारक है” की चेतावनी के बावजूद दुकानदार इसे बच्चों को बेच रहे हैं।COTPA (तंबाकू नियंत्रण कानून) के नियम कागजों तक सीमित हैं। स्थानीय नागरिकों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि प्रशासन बड़े-बड़े कार्यक्रम तो आयोजित करता है, लेकिन इन अवैध ठिकानों पर छापेमारी और नशीले पदार्थों की बिक्री पर रोक लगाने में विफल साबित हो रहा है।पाकुड़ के नौनिहालों का भविष्य दांव पर है। यदि समय रहते प्रशासन ने ‘फोटो खिंचवाने वाले अभियानों’ से निकलकर धरातल पर सख्त कार्रवाई नहीं की, तो नशे का यह काला खेल जिले की एक पूरी पीढ़ी को लील जाएगा।क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और अभिभावकों ने जिला प्रशासन से अविलंब उन दुकानों और सप्लायरों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है जो बच्चों को मौत का यह सामान बेच रहे हैं।

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