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March 16, 2026 8:52 pm

टपक सिंचाई ने बदली कोनिका दीदी की तकदीर, गृहिणी से बनीं सफल किसान

महिला ने 25 डिसमिल से शुरू की आधुनिक खेती, अब एक एकड़ में खीरा-तरबूज से लाखों की आय की उम्मीद

पाकुड़/महेशपुर प्रखंड के सीतारामपुर गांव की कोनिका कोड़ाइन की कहानी इस बात का मजबूत उदाहरण है कि खेती में नई तकनीक और सही मार्गदर्शन से ग्रामीण महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकती हैं। कभी घर-गृहस्थी तक सीमित रहने वाली कोनिका दीदी आज सूक्ष्म टपक सिंचाई तकनीक से सफल खेती कर इलाके की महिलाओं और किसानों के लिए प्रेरणा बन गई हैं। कोनिका दीदी वर्ष 2021 में गांव में चलाए गए विशेष अभियान के दौरान दीदी सागेन साकाम आजीविका सखी मंडल से जुड़ीं। स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने नियमित बचत शुरू की और धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया। इसी दौरान वे झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के तहत संचालित जापान इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन एजेंसी (JICA) परियोजना से जुड़ीं। परियोजना के माध्यम से उन्हें सूक्ष्म टपक सिंचाई यंत्र, बर्मी कम्पोस्ट यूनिट और पॉली नर्सरी हाउस उपलब्ध कराया गया। शुरुआत में उन्हें इस नई तकनीक पर भरोसा नहीं था, लेकिन JSLPS की ओर से रांची के ओरमांझी और अनगड़ा प्रखंड में प्रगतिशील किसानों के खेतों का भ्रमण कराने के बाद उनका नजरिया बदला। इसके बाद उन्होंने 25 डिसमिल जमीन पर पहली बार टपक सिंचाई से तरबूज की खेती की। इस खेती से उन्हें करीब 47,400 रुपए की शुद्ध आमदनी हुई। यही सफलता उनके लिए नया मोड़ साबित हुई। पहली कमाई से बढ़ा हौसला तो जनवरी 2026 में उन्होंने अपने एक एकड़ खेत में खीरा और तरबूज की खेती शुरू कर दी। अभी खीरे की तुड़ाई जारी है। अब तक वे करीब 5 क्विंटल खीरा मुरारई और नलहट्टी बाजार में औसतन 65 रुपए प्रति किलो की दर से बेच चुकी हैं, जिससे उन्हें 32,500 रुपए की आमदनी हो चुकी है। आने वाले दिनों में इसी फसल से 1 लाख से 1.20 लाख रुपए तक आय होने की संभावना जताई जा रही है। वहीं तरबूज की फसल में भी फूल आ चुके हैं, जिससे अच्छी पैदावार की उम्मीद है। कोनिका दीदी की सफलता ने यह साबित किया है कि खेती अब केवल परंपरागत मेहनत का काम नहीं, बल्कि तकनीक और योजना के साथ बड़ा लाभ देने वाला माध्यम भी बन सकती है। उनकी मेहनत से न सिर्फ परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि आसपास की ग्रामीण महिलाओं और किसानों में भी नई सोच पैदा हुई है।
कोनिका दीदी कहती हैं कि समूह से जुड़ने, प्रशिक्षण लेने और तकनीकी सहयोग मिलने के बाद ही वे आज इस मुकाम तक पहुंच सकी हैं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय JSLPS और JICA परियोजना को दिया है।

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