चैनपुर: पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड के नरसिंहपुर पथरा गांव में जमीन को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक कार्यशैली और न्यायिक प्रक्रिया दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि स्वर्गीय भगवान साव के पुत्र श्रवण कुमार गुप्ता, मनोज कुमार गुप्ता और राजेश कुमार गुप्ता ने जमीन को लेकर ऐसा खेल खेला, जिसमें कानून और सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा तक को दरकिनार कर दिया गया।
जानकारी के अनुसार, चैनपुर अंचल कार्यालय ने जिस आधार पर जमीन से सीता साव का नाम हटाने की कार्रवाई की, वह मामला पहले हाई कोर्ट में था। लेकिन बाद में उसी केस को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और मामला वहां तक पहुंच गया। इसके बावजूद अंचल कार्यालय द्वारा जल्दबाजी में जमीन के कागजात से सीता साव का नाम हटाने की कार्रवाई कर दी गई।
स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा तेज है कि आखिर किसकी छत्रछाया में चैनपुर अंचल कार्यालय ने इतनी बड़ी कार्रवाई कर दी। यदि सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन था तो प्रशासन को इंतजार करना चाहिए था, लेकिन इसके उलट जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव कर दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जब मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुका था और जमीन का विधिवत बंटवारा भी नहीं हुआ था, तो आखिर किस नियम और किस दबाव में यह फैसला लिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक जमीन का मामला नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था के सम्मान से जुड़ा विषय है।
अब ग्रामीणों और स्थानीय लोगों की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी सामने आना चाहिए कि आखिर किसके संरक्षण में यह फैसला लिया गया और क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उसकी गरिमा का सम्मान करना जरूरी नहीं समझा गया।
यह मामला अब केवल एक जमीन विवाद नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, न्यायिक मर्यादा और सत्ता के प्रभाव का भी बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी? चैनपुर अंचल कार्यालय और स्व भगवान साव के बेटों पर उठे गंभीर सवाल कैसे इतना बड़ा खेल
चैनपुर: पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड के नरसिंहपुर पथरा गांव में जमीन को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक कार्यशैली और न्यायिक प्रक्रिया दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि स्वर्गीय भगवान साव के पुत्र श्रवण कुमार गुप्ता, मनोज कुमार गुप्ता और राजेश कुमार गुप्ता ने जमीन को लेकर ऐसा खेल खेला, जिसमें कानून और सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा तक को दरकिनार कर दिया गया।
जानकारी के अनुसार, चैनपुर अंचल कार्यालय ने जिस आधार पर जमीन से सीता साव का नाम हटाने की कार्रवाई की, वह मामला पहले हाई कोर्ट में था। लेकिन बाद में उसी केस को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और मामला वहां तक पहुंच गया। इसके बावजूद अंचल कार्यालय द्वारा जल्दबाजी में जमीन के कागजात से सीता साव का नाम हटाने की कार्रवाई कर दी गई।
सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जब मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुका था और जमीन का विधिवत बंटवारा भी नहीं हुआ था, तो आखिर किस नियम और किस दबाव में यह फैसला लिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक जमीन का मामला नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था के सम्मान से जुड़ा विषय है।
स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा तेज है कि आखिर किसकी छत्रछाया में चैनपुर अंचल कार्यालय ने इतनी बड़ी कार्रवाई कर दी। यदि सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन था तो प्रशासन को इंतजार करना चाहिए था, लेकिन इसके उलट जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव कर दिया गया।
अब ग्रामीणों और स्थानीय लोगों की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी सामने आना चाहिए कि आखिर किसके संरक्षण में यह फैसला लिया गया और क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उसकी गरिमा का सम्मान करना जरूरी नहीं समझा गया।
यह मामला अब केवल एक जमीन विवाद नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, न्यायिक मर्यादा और सत्ता के प्रभाव का भी बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
Related Posts

इफ्तीयार पार्टी के नाम पर मुसलमानो के बिच मे घुस घुस कर खायंगे, लेकिन अपने ही डोम, भुईया, भंगी, मुसहर दलितों के घर खाने कभी नही खायंगे : पलामू प्रमंडल की आवाज अविनाश राजा हिन्दू परिषद अध्यक्ष









