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May 12, 2026 4:13 pm

बालू के अवैध उत्खनन से वीरान हो गई बांसलोई नदी, अब गंभीर जल संकट झेल रहे हैं लोग

पानी के अभाव से फसल का उत्पादन प्रभावित, किसान परेशान

सतनाम सिंह

पाकुड़: आये दिन यह चर्चा होती है, कि लोग अपने-अपने फायदे के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, इसका जीता जागता उदाहरण है, पाकुड जिले के महेशपुर प्रखंड के बीचों बीच गुजरने वाली बाँसलोई नदी की है. साथ ही नदी में बने चार पुलों में संकट का छाया मंडराता हुआ दिख रहा है. बालू माफियाओं के द्वारा नदी में बने हुए पुल के समीप से ही धड़ल्ले से उठाव के कारण आज बांसलोई नदी सूखने के साथ-साथ नदी में बनाये गये पुल में भी खतरों का संकेत दें रहा हैं. इतना ही नहीं प्रखंड के ढाई लाख की आबादी की सुविधा के लिए बनाये गये पुल के साथ-साथ प्रखंडो में पेयजल की किल्लत दूर करने को लेकर इंटेकवेल व पानी टंकी बनाया गया था. वही पानी टंकी के लिए बाँसलोई नदी में 10-15 फिट का कुंआ (इंटेकवेल) 15 मीटर चौड़ा 6 करोड़ 38 लाख 52 हजार 350 रुपए खर्च कर बनाया गया था. वही बालू माफियाओं के बुरे नजर पुल के साथ-साथ बाँसलोई नदी में बनाये गए कुएं में पड़ते ही इंटेकवेल के समीप से बालू का उठाव कर वहां के जलस्तर को ही खत्म कर दिया. बालू माफियाओं ने इस तरह अपने कारोबार में मशगूल व प्रशासन से बेख़ौफ़ हो चुके हैं, की उन्हें नदी पर बनाये गये पुलों के अस्तित्व व पानी टंकी का ध्यान नहीं रहा. बालू माफियाओं के कारण नदी का धारा अब समाप्त हो चुकी है. बांसलोई नदी अब नाले की रूप ले चुकी है.आपको बता दें कि प्रशासन ने बालू माफियाओं के खिलाफ नट कशने में देर करदी है, लेकिन एक बात साफ है, इस तरह से नदी खत्म होती रही तो नदी से सटे हुए गांव के ग्रामीण एवं किसान को खेतीबाड़ी में उनको काफ़ी मुश्किलो का सामना करना पड़ेगा. साथ ही पशु, पक्षी ही नहीं इंसान पानी पीने के लिए मौहताज हो जाएगी. समय रहने पर ध्यान न देने से इस पर रोक न लगाया तो यह कहने में गुरेज नहीं है कि महेशपुर ग्वालपाड़ा के समीप बने पुल की तरह पेयजल के लिए नदी में बन रहे कुआ के समेत गड़बाडी पुल भी अपना जवाब देने में देर नहीं करेगी. तथा आपको बताते चले कि ये तीन बड़े पुल में कई जगहों पर अपना जर्ज-जर्ज रूप धारण करने लगी है, और अत्यधिक बालू का उठाव के कारण पानी टँकी आज तक यहां के लोगों को एक बूंद पानी दे नहीं सकी.

एनजीटी लगते ही बांसलोई नदी की बच रही है जान

एनजीटी लगते ही बांसलोई नदी में ट्रैक्टर दिख नहीं रही है. बालू माफिया एनजीटी लगते ही अपने इस बालू खनन कारोबार को बंद रखा हुआ है. जिससे बांसलोई नदी में कही- कही पानी दिख रही है.

बाँसलोई नदी में इन जगहों पर है, पुल

पहला पुल ग्वालपाड़ा के समीप. दूसरा पुल बलियाडंगाल के समीप परियादहा में बना हुआ है. तीसरा पुल घाटचोरा के समीप बना था. लेकिन वह पुल तेज बाढ़ को सह नहीं पाया और खिलोने की तरह नदी में बहते हुए वर्तमान सरकार के ऊपर कई सवाल खड़ा कर दी थी. लेकिन सरकार ने दोबारा इस पुल को स्वीकृति देते हुए पुल का निर्माण की जा रही है. उधर चौथा पुल गड़बाड़ी गांव के समीप बना हुआ है, ये चारों पुल झारखंड राज्य अलग होने के बाद वर्ष 2017 तक महेशपुर प्रखंड में बना हुआ है, जबकि नुराई- अमृतपुर गांव के समीप बांसलोई नदी के बीचों बीच नये पुल का निर्माण किया जा रहा है.

क्या कहते हैं किसान

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किसान आसारी शेख ने कहा कि बांसलोई नदी महेशपुर की जीवन रेखा कहा जाता था. कभी इतना पानी मे नदी भरा हुआ रहता था. और हम किसान नदी के पानी से ही खेतीबाड़ी करते थे. अब हमलोगों को खेतीबाड़ी करने के लिए बोरिंग का पानी खरीदकर खेतीबाड़ी करना पड़ता है. सरकार यदि बांसलोई नदी में बांध बनाती है तो किसानों को काफी लाभ मिलेगा.
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किसान राजू लेट ने कहा कि बांसलोई नदी की पानी इर्द गिर्द आबाद दर्जनों बस्तियों के हजारों लोग उसे पीते थे. नहाने धोने मवेशियों को पिलाने और खेतों की सिंचाई के लिए नदी का पानी ही इस्तेमाल होता था. लेकिन आज के दिन नदी सुखी पड़ी है. जिससे हमलोगों को खेतीबाड़ी करने के लिए बिजली व बोरिंग के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता है.
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किसान साईमुद्दीन शेख ने कहा कि आज बांसलोई नदी नाम का ही है. नदी में पानी है ना ही बालू की रेत है. कुछ सालों पहले ये नदी एक अलग धारा में बहती थी. ये बालू माफियाओं के वजह से नदी घुट- घुट कर खत्म के कगार पर है. कहा कि यदि नदी में कही बांध बनाया जाय तो हम किसानों को खेतीबाड़ी करने के सोहलियत होगी.

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