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April 30, 2026 1:40 pm

जिउतिया पर्व धूमधाम से मनाया गया, माताओं ने व्रत कथा सुनी और पुत्रों के दीर्घायु की कामना की

बजरंग पंडित

पाकुड़िया जिउतिया का पर्व बुधवार को पाकुड़िया स्थित तिरपितिया नदी तट पर एवं काली मंदिर परिसर में पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। माताओं ने स्नान ध्यान के बाद व्रत कथा सुनी और अपने पुत्रों के दीर्घायु की कामना की।दरअसल, एक मां पुत्रों के कल्याण के लिए कितना त्याग करती है, इसका उदाहरण है जिउतिया पर्व। पंडित पवन झा ने बताया कि इसे जिवित्पुत्रिका वर्त के नाम से भी जाना जाता है। अश्वीन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को संतान की आयु आरोग्य तथा कल्याण के लिए किया जिउतिया का व्रत रखा जाता है। हिन्दू धर्म में इस पर्व को सभी जाति के लोग मनाते हैं । श्री झा ने इससे जुड़ी कथाओं के संबंध में बताया कि इसमें कई लोककथाएं है। इसमें एक कथा चील व सियारिन की है। प्राचीन समय में जंगल में एक चील और सियारिन रहा करती थी। दोनों में मित्रता थी। दोनों ने कुछ स्त्रियों को इस व्रत करते देखा। उसने प्रण किया कि वे भी इस व्रत को करेंगे। दोनों ने व्रत प्रारंभ किया। भूख के कारण सियारिन की हालत खराब हो गयी। वह भूख बर्दाश्त नहीं कर पायी और चुपके से भोजन कर ली। नतीजा यह निकला कि सियारिन के जितने भी बच्चे हुए कुछ ही दिनों में मृत हो गये जबकि चील के बच्चों को दीर्घ जीवन मिला। इसके अलावा इस व्रत के साथ जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनी जाती है। इस कथा में कहा गया है कि गंधर्वो के राजकुमार का नाम जीभूतवाहन था। एक दिन वह जंगल में भ्रमण कर रहा था। उसे एक विलाप करती वृद्धा दिखी। उसके रोने का कारण पूछने पर उसने कहा कि वह नागवंश की स्त्री है। गरुड़ को भोजन देने के लिए उसके पास अपने पुत्र के अलावा और कुछ नहीं है। राजकुमार ने वृद्धा को वचन दिया कि वह उसके पुत्र को बचाएगा। उसके बाद वह स्वयं लाल कपड़े में लिपटाकर गरुड़ के सामने लेट गया। गरुड़ आए और वह उसे उठाकर पहाड़ पर ले गए। चंगुल में फंसे व्यक्ति की कोई प्रतिक्रिया न देखकर गरुड़ ने उससे उसका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने गरुड़ को पूरी जानकारी दी। गरुड़ ने जीमूतवाहन की बहादुरी और परोपकार की भावना को देखकर जीवन दान दे दिया और नागो की बली न लेने का वरदान भी दिया। पुत्र को जीवन दान मिलने से इस व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत के रुप में किया जाता है।

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