मो० काजीरुल शेख
पाकुड़: जहां चाह, वहां राह”—इसी कहावत को सच कर दिखाया है महेशपुर प्रखंड के बलियापत्रा गांव की माया देवी ने। पहले मजदूरी कर किसी तरह गुज़ारा कर रही माया दीदी आज तकनीकी खेती से आत्मनिर्भर बन चुकी हैं और इलाके की महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं।माया देवी साल 2017 से पहले पारंपरिक खेती और मजदूरी कर जीवनयापन करती थीं। तभी गांव में गणेश आजीविका स्वयं सहायता समूह का गठन हुआ और माया दीदी इससे जुड़ गईं। शुरुआत में उन्होंने समूह से 16 हजार रुपये का लोन लेकर बैंगन और टमाटर की खेती शुरू की, जिससे 65 हजार रुपये का मुनाफा हुआ।
ड्रिप सिंचाई और कुसुम योजना से मिली रफ्तार
2021 में JSLPS के तहत JICA परियोजना से जुड़ने के बाद उन्हें सूक्ष्म टपक सिंचाई यंत्र मिला। इसके बाद उन्होंने 1 लाख रुपये का ऋण लेकर ड्रिप बोरिंग की और कुसुम योजना के तहत सोलर पंप भी लगवाया। इस तकनीक से उन्होंने 33 डिसमिल में रेड लेडी प्रजाति का पपीता और 25 डिसमिल में फूलगोभी की खेती की। नतीजा: 2.5 लाख रुपये की शुद्ध कमाई, जिसमें से उन्होंने ऋण भी चुका दिया।
अब ऑनलाइन पौधे मंगाकर उगा रहीं पपीता
2024 में उन्होंने गुजरात की मुनिवर नर्सरी से 300 रेड लेडी पपीते के पौधे ऑनलाइन मंगवाए। इनमें से 140 पौधों से अब तक 2000 किलो पपीता बिक चुका है, जिससे 1.3 लाख रुपये की आमदनी हुई। लागत हटा कर अब तक 60 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा हो चुका है, और 30 हजार की आमदनी और होने की संभावना है। अप्रैल 2025 में उन्होंने VNR अमीना प्रजाति के 250 पौधे और लगाए हैं। बेटों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने का सपना अब माया दीदी अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने का सपना देख रही हैं। उन्होंने बताया कि “समूह से जुड़कर मेरा जीवन ही बदल गया। अब मैं चाहती हूं कि और भी महिलाएं इस राह पर चलें और आत्मनिर्भर बनें।”
तकनीकी खेती और सरकारी योजनाओं से सशक्त हो रहीं ग्रामीण महिलाएं
पाकुड़ जिले में इस तरह की सफल कहानियां यह साबित करती हैं कि सरकार की योजनाएं जब सही हाथों तक पहुँचती हैं, तो ज़िंदगी संवर जाती है।





