पाकुड़। गुरुद्वारा साध संगत, पंजाबी मोहल्ला में सिख धर्म के दसवें गुरु, साहिब-ए-कमाल दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश पर्व रविवार को श्रद्धा, उत्साह और गरिमामय वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर पंजाबी और सिंधी समाज के साथ-साथ शहर व बाहर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुरुद्वारे पहुंचे। श्रद्धालुओं ने माथा टेका, गुरु की वाणी श्रवण की, अरदास में भाग लिया और प्रसाद व लंगर ग्रहण किया। गुरुद्वारा परिसर में पूरे दिन भक्ति और सेवा का माहौल बना रहा। गुरुद्वारा साध संगत पंजाबी मोहल्ला कमेटी की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा और व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा गया। कीर्तन दरबार के माध्यम से गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन, त्याग और बलिदान को स्मरण किया गया। ग्रंथों के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी, संवत 1723 (ईस्वी 1666) को पटना साहिब में हुआ था। इसी परंपरा के अनुसार सिख समाज पौष मास में गुरु जी का जन्मदिवस प्रकाश पर्व के रूप में मनाता है।
पटना साहिब से आनंदपुर तक प्रेरणादायी यात्रा
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म ऐसे समय में हुआ, जब देश सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। उनके पिता नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। पिता के शहादत के बाद मात्र नौ वर्ष की आयु में गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरुगद्दी संभाली और अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष को नई दिशा दी।
खालसा पंथ की स्थापना
वर्ष 1699 में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर सिख इतिहास को निर्णायक मोड़ दिया। ‘पंज प्यारे’ की दीक्षा के माध्यम से समानता, साहस और अनुशासन का संदेश दिया गया। पाँच ककार—केश, कंघा, कड़ा, कच्छा और कृपाण—धारण करने की मर्यादा देकर सिख पहचान को सशक्त स्वरूप प्रदान किया गया।
मानवता और समानता का संदेश
गुरु गोबिंद सिंह जी केवल महान योद्धा ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के कवि और दार्शनिक भी थे। दसम ग्रंथ में संकलित उनकी रचनाएं धर्म, नीति, वीरता और भक्ति का अद्भुत संगम हैं। उनका प्रसिद्ध कथन “मानस की जात सबै एकै पहचानबो” आज भी सामाजिक समानता और भाईचारे का प्रेरणास्रोत है।
चार साहिबजादों का अद्वितीय बलिदान
गुरु जी के चारों पुत्र—अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह—का बलिदान भारतीय इतिहास में अद्वितीय है। दो पुत्र युद्धभूमि में शहीद हुए, जबकि दो बाल साहिबजादों को दीवार में जीवित चुनवा दिया गया। इसके बावजूद गुरु जी का धैर्य और धर्म के प्रति अडिग विश्वास मानव इतिहास में अनुपम उदाहरण है।
गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु
अपने जीवन के अंतिम चरण में गुरु गोबिंद सिंह जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का अंतिम और शाश्वत गुरु घोषित कर गुरुगद्दी की परंपरा को समाप्त किया। इससे सिख धर्म में गुरु और ग्रंथ का एकाकार स्वरूप स्थापित हुआ।
सेवा और समर्पण का पर्व
प्रकाश पर्व के अवसर पर गुरुद्वारों में अखंड पाठ, कीर्तन दरबार और लंगर का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने गुरु जी के जीवन से प्रेरणा लेकर सत्य, साहस और सेवा के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। गुरु गोबिंद सिंह जी आज भी संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनका जीवन अन्याय के विरुद्ध खड़े होने, आत्मसम्मान बनाए रखने और मानवता की रक्षा के लिए समर्पित रहने का संदेश देता है। प्रकाश पर्व यही याद दिलाता है कि धर्म की रक्षा चरित्र, साहस और सत्य से होती है।

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