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March 10, 2026 4:15 am

बाल विवाह मुक्ति रथ से गांव-गांव जागरूकता, हजारों लोगों तक पहुंचा कुप्रथा खत्म करने का संदेश।

पाकुड़: बाल विवाह जैसी कुप्रथा के खिलाफ जिले में चलाया गया ‘बाल विवाह मुक्ति रथ’ अभियान जागरूकता का सशक्त माध्यम बनकर उभरा। भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की पहल पर चलाए जा रहे 100 दिवसीय गहन जागरूकता अभियान के तहत जन लोक कल्याण परिषद् ने जिला प्रशासन के सहयोग से पूरे जिले में व्यापक जनजागरूकता कार्यक्रम संचालित किए। अभियान के दौरान ‘बाल विवाह मुक्ति रथ’ ने जिले के विभिन्न गांवों और कस्बों का भ्रमण कर लोगों को बाल विवाह के दुष्परिणाम और इसके कानूनी पहलुओं के बारे में जानकारी दी। रैली, विद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रम और जनसंवाद के माध्यम से करीब 25 हजार से अधिक लोगों तक यह संदेश पहुंचाया गया कि बाल विवाह न केवल सामाजिक कुरीति है बल्कि कानूनन दंडनीय अपराध भी है। कार्यक्रम के दौरान लोगों को बताया गया कि बाल विवाह बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। कई स्थानों पर ग्रामीणों को बाल विवाह नहीं कराने की शपथ भी दिलाई गई और समाज से इस कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने की अपील की गई। अभियान को तीन चरणों में संचालित किया गया। पहले चरण में विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से छात्रों को जागरूक किया गया। दूसरे चरण में धर्मगुरुओं से अपील की गई कि विवाह संपन्न कराने से पहले वर-वधू की आयु की जांच सुनिश्चित करें और बाल विवाह कराने से इनकार करें। साथ ही कैटरर्स, सजावट कर्मियों, बैंक्वेट हॉल संचालकों, बैंड-बाजा और घोड़ी उपलब्ध कराने वालों से भी आग्रह किया गया कि वे बाल विवाह में अपनी सेवाएं न दें, क्योंकि ऐसे मामलों में सहयोग करना भी कानूनन अपराध है। तीसरे चरण में पंचायत स्तर पर व्यापक जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। जन लोक कल्याण परिषद् के सचिव सरोज कुमार झा ने कहा कि ‘बाल विवाह मुक्ति रथ’ केवल एक प्रतीकात्मक यात्रा नहीं, बल्कि समाज में बदलाव का संदेश लेकर निकला अभियान है, जिसे लोगों ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि बाल विवाह किसी भी बच्ची के जीवन की संभावनाओं को खत्म कर देता है और उसे कुपोषण, अशिक्षा और गरीबी के दुष्चक्र में धकेल देता है। संस्था द्वारा संचालित बाल आश्रय गृह भी जरूरतमंद बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बना है। यहां बेसहारा, दुर्व्यवहार के शिकार या आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को 18 वर्ष की आयु तक सुरक्षित आवास, पौष्टिक भोजन, शिक्षा और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। प्रशिक्षित कर्मचारियों की देखरेख में बच्चों के शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

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