राज कुमार भगत
पाकुड़। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर लोक आस्था, नेम-निष्ठा और पवित्रता का महापर्व छठ पूजा उषाकालीन अर्घ्य के साथ विधि-विधानपूर्वक संपन्न हो गया। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व नहाय-खाय से शुरू होकर खरना, संध्या अर्घ्य और अंततः उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ पूर्ण हुआ। बुधवार की अहले सुबह करीब 5 बजे से ही व्रती महिलाएं और पुरुष स्नान-ध्यान कर नए वस्त्रों में नंगे पांव छठ घाटों पर पहुंचने लगे। शहर के काली भाषण तालाब, अकाड़ी पोखर और तीन बंगला स्थित घाटों सहित जिले के विभिन्न शहरी व ग्रामीण इलाकों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। व्रतियों ने सूप में फल-प्रसाद सजाकर पूर्व दिशा की ओर दीप प्रज्वलित किया और कमर भर पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य को दूध व गंगाजल से अर्घ्य अर्पित किया। इस दौरान घाटों पर छठ गीतों की मधुर गूंज सुनाई दी— “कांच ही बांस के बहंगिया…” जैसे पारंपरिक लोकगीतों ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। व्रतियों ने सूर्य देव से परिवार की सुख-समृद्धि, संतानों की लंबी आयु और घर-परिवार की मंगलकामना की।
अर्घ्य के बाद परंपराओं का पालन।
अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाओं ने घर लौटकर विधि अनुसार पारंपरिक रीति-रिवाज निभाए। सुहागिन महिलाओं ने नाक से मांग तक सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य की कामना की और बड़ों का आशीर्वाद लिया। इसके साथ ही एक-दूसरे को छठ की शुभकामनाएं दी गईं और प्रसाद का वितरण किया गया।
प्रसाद का विशेष महत्व।
छठ पूजा में ठेकुआ, कसार, फल-फूल, गन्ना, नारियल, केला आदि प्रसाद का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि छठी मैया का प्रसाद श्रद्धापूर्वक ग्रहण करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और कई तरह की परेशानियां दूर होती हैं। उषाकालीन अर्घ्य के साथ चार दिनों से चल रहा सूर्य उपासना का यह महापर्व श्रद्धा, शांति और सौहार्द के माहौल में संपन्न हो गया।







