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June 13, 2026 12:47 am

आधुनिक दौर में भी कायम है आदिवासी परंपरा, पालकी पर सवार होकर दूल्हा पहुंचा ससुराल।

मांदर-ढोल की थाप और पारंपरिक नृत्य के बीच निकली बारात, संस्कृति की दिखी अनोखी झलक।

प्रशांत मंडल

लिट्टीपाड़ा (पाकुड़): आज के आधुनिक दौर में जहां शादी-विवाह समारोहों में लग्जरी गाड़ियों और आधुनिक साधनों का चलन तेजी से बढ़ रहा है, वहीं आदिवासी समाज अपनी सदियों पुरानी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को आज भी पूरी निष्ठा के साथ संजोए हुए है। लिट्टीपाड़ा प्रखंड क्षेत्र के कई आदिवासी गांवों में विवाह के अवसर पर दूल्हे को पालकी पर बैठाकर बारात ले जाने की परंपरा अब भी जीवंत है। हाल ही में क्षेत्र के एक आदिवासी विवाह समारोह में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। पारंपरिक वेशभूषा में सजे दूल्हे को पालकी पर बैठाकर बारात निकाली गई। गांव के युवक और परिजन अपने कंधों पर पालकी उठाकर आगे बढ़े। इस दौरान मांदर, ढोल और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच बाराती पारंपरिक नृत्य करते हुए नजर आए। यह दृश्य लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बना रहा। ग्रामीणों के अनुसार, पालकी पर दूल्हे को ले जाने की यह परंपरा उनके पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है। बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद समाज के लोग अपनी संस्कृति और रीति-रिवाजों को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। उनके लिए विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि समाज की परंपरा, संस्कृति और पहचान को आगे बढ़ाने का अवसर भी है। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि आदिवासी समाज में विवाह समारोहों में पारंपरिक रस्मों का विशेष महत्व होता है। यही कारण है कि आज भी कई गांवों में शादी के दौरान पालकी, मांदर और पारंपरिक नृत्य जैसी सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है। आधुनिकता के दौर में भी ऐसी परंपराएं यह संदेश देती हैं कि विकास के साथ अपनी संस्कृति और विरासत को सहेजकर रखना भी उतना ही जरूरी है। लिट्टीपाड़ा क्षेत्र में दिखी यह परंपरा आदिवासी समाज की सांस्कृतिक समृद्धि और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की मिसाल पेश करती है।

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