जलमग्न सड़क पर पलट रहे टैंपू और ई-रिक्शा, कीचड़ में धक्के लगाने को मजबूर राहगीर।
पीपलजोड़ी से चेंगाडांगा तक बदहाली का सफर, मरीजों से स्कूली बच्चों तक की जिंदगी दांव पर।
पाकुड़ जिले की प्रशासनिक सरपरस्ती और पथ निर्माण विभाग की आपराधिक अनदेखी का खामियाजा आज पूरा पाकुड़ भुगत रहा है। पाकुड़-राजग्राम मालपहाड़ी सड़क (पीपलजोड़ी मोड़ से चेंगाडांगा मोड़ तक) आज सिर्फ गड्ढों का अंबार नहीं, बल्कि प्रशासनिक नाकामी की जीती-जागती मिसाल बन चुकी है। लाखों-करोड़ों का राजस्व देने वाले इस खनन क्षेत्र में सड़कों की यह बदहाली यह बताने के लिए काफी है कि जिला प्रशासन को आम जनता की सहूलियत से कोई सरोकार नहीं रह गया है।तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह सड़क पर पानी से भरे विशाल गड्ढे बने हुए हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि बीच राह में टोटो और ई-रिक्शा पलट रहे हैं, जिन्हें स्थानीय लोग और यात्री मिलकर पानी और कीचड़ के बीच से धक्का देकर निकालने को मजबूर हैं। सड़क किनारे डस्ट और मलबे का साम्राज्य है, जहां हर पल हादसे का साया मंडराता रहता है।

कागजों में मरम्मत, जमीन पर सिर्फ कीचड़ और गड्ढे
विभाग ने कुछ साल पहले सड़क बनाई और फिर रस्म अदायगी के नाम पर मरम्मत का नाटक भी किया। सवाल उठता है कि जब यह अंतरराज्यीय मार्ग है और रोजाना दर्जनों भारी वाहन गुजरते हैं, तो ऐसी गुणवत्ताहीन सामग्री का इस्तेमाल क्यों किया गया? क्या पथ निर्माण विभाग और जिला प्रशासन को यह नहीं दिखता कि मरम्मत के कुछ ही दिनों बाद सड़क फिर से बह जाती है? आखिर ठेकेदारों और अधिकारियों के इस गठजोड़ का खामियाजा जनता कब तक भुगतेगी?

मरीजों और मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़
पाकुड़ में स्वास्थ्य विभाग का हाल किसी से छिपा नहीं है। गंभीर स्थिति में मरीजों को पश्चिम बंगाल के रामपुरहाट, बर्धमान या कोलकाता ले जाना पड़ता है। लेकिन इस खस्ताहाल सड़क के कारण मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही जिंदगी की जंग हारने की कगार पर पहुंच जाते हैं। दूसरी ओर, नबीनगर उच्च विद्यालय समेत कई स्कूलों में जाने वाले मासूम बच्चे रोज मौत की राह से गुजरने को मजबूर हैं। भारी-भरकम ट्रकों की आवाजाही और जलजमाव के बीच अपने नौनिहालों को स्कूल भेजना अभिभावकों के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। आक्रोशित ग्रामीण एवं राहगीर का कहना है कि प्रशासन को केवल राजस्व वसूली से मतलब है। न पथ निर्माण विभाग के साहबों को जनता का दर्द दिखता है और न ही जिला प्रशासन को। लगता है प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है। अब सवाल यहां उठता है कि आखिर कब जागेगा जिला प्रशासन? क्या पाकुड़ की ‘लाइफलाइन’ को जानलेवा बनते देखना ही प्रशासनिक मुस्तैदी है? जिला प्रशासन और पथ निर्माण विभाग को अब अपनी कुंभकर्णी नींद तोड़नी ही होगी। केवल नोटिस जारी करने और कागजी समीक्षा बैठकों से सड़क के गड्ढे नहीं भरेंगे। प्रशासन को अविलंब इस मामले में हस्तक्षेप कर दोषी ठेकेदारों और अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, और इस सड़क का ठोस व स्थायी सुदृढ़ीकरण कराना चाहिए, ताकि आम जनता को इस नरकीय यातना से मुक्ति मिल सके।







