हिरणपुर/पाकुड़। किताबें अगर बच्चों की नजरों से दूर रहेंगी तो पढ़ने की जिज्ञासा भी सीमित रह सकती है। इसी सोच को बदलने की पहल उत्क्रमित उच्च विद्यालय डांगापाड़ा ने की है। विद्यालय में किताबों के लिए बड़ी अलमारी लगाने के बजाय एक खाली दीवार को ही आकर्षक ‘ज्ञान की दीवार’ (Book Wall) का रूप दिया गया है। कम जगह में सैकड़ों किताबों को इस तरह सजाया गया है कि उनके कवर बच्चों को दूर से ही दिखाई दें और उन्हें पुस्तक उठाकर पढ़ने की उत्सुकता हो।
कम जगह में ज्यादा किताबें, आकर्षण भी भरपूर
विद्यालय की दीवार पर लकड़ी की पट्टियों और निर्धारित स्तरों की मदद से किताबों को व्यवस्थित ढंग से प्रदर्शित किया गया है। इससे जहां फर्श की जगह बची है, वहीं पुस्तकें बंद अलमारी में छिपी रहने के बजाय बच्चों की आंखों के सामने रहती हैं। अलग-अलग विषयों और रुचियों की किताबों के कवर दीवार को एक साथ पुस्तकालय, सूचना-पट्ट और शिक्षण संसाधन का स्वरूप देते हैं। विद्यालय प्रबंधन का मानना है कि जब किताबें अलमारी में बंद रहती हैं तो कई बार बच्चों को यह पता ही नहीं चलता कि पुस्तकालय में उनके लिए क्या-क्या उपलब्ध है। इसके विपरीत, किताबों को सामने देखकर बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा होती है। वे पुस्तक के बारे में पूछते हैं और उसे पढ़ने की इच्छा जताते हैं।
निर्देश नहीं, माहौल से बढ़ेगी पढ़ने की आदत
‘ज्ञान की दीवार’ का उद्देश्य केवल किताबों को सजाना नहीं, बल्कि विद्यालय में पठन संस्कृति (Reading Culture) विकसित करना है। बच्चों को पढ़ने के लिए बार-बार निर्देश देने के बजाय ऐसा वातावरण तैयार किया जा रहा है, जहां किताब खुद उन्हें अपनी ओर आकर्षित करे।
इस पहल के पीछे तीन प्रमुख विचार हैं—किताब बच्चों की नजर और पहुंच के करीब हो, सीमित संसाधनों में उपलब्ध स्थान का बेहतर इस्तेमाल हो और पढ़ना बच्चों के लिए बोझ नहीं, बल्कि रुचि और आनंद का विषय बने।
अब दीवार पर दिखेगी बच्चों की पसंद
विद्यालय इस पहल को आगे और जीवंत बनाने की तैयारी में है। ‘आज की किताब’, ‘इस सप्ताह की पुस्तक’, ‘विद्यार्थी की पसंदीदा किताब’ और ‘मैंने यह किताब क्यों पढ़ी’ जैसी गतिविधियों को इससे जोड़ा जा सकता है। विद्यार्थी पुस्तक पढ़ने के बाद उसकी छोटी समीक्षा भी लिख सकेंगे। बड़े विद्यार्थी छोटे बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार पुस्तक चुनने में मदद करेंगे। इस तरह यह दीवार महज किताबें रखने की जगह न रहकर ‘लिविंग रीडिंग स्पेस’ यानी जीवंत पठन केंद्र का रूप ले सकती है।
छोटी पहल, बड़ा संदेश
डांगापाड़ा विद्यालय की यह पहल बताती है कि शिक्षा में नवाचार के लिए हमेशा बड़े बजट या आधुनिक तकनीक की जरूरत नहीं होती। उपलब्ध संसाधनों और थोड़ी रचनात्मक सोच से भी बच्चों के लिए सीखने का बेहतर वातावरण तैयार किया जा सकता है।विद्यालय की यह दीवार आज सिर्फ किताबों को नहीं सजा रही, बल्कि बच्चों की कल्पनाओं, सपनों और ज्ञान की संभावनाओं को भी सामने ला रही है। यही वजह है कि इसे महज ‘बुक वॉल’ कहना कम होगा—यह सचमुच ‘ज्ञान की दीवार’ बन गई है।







