पाकुड़। जब्त वाहन को मुक्त कराने के मामले में पुलिस अनुसंधानकर्ता की दो विरोधाभासी रिपोर्ट सामने आने पर प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिवाकर पांडे की अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सहायक अवर निरीक्षक सह अनुसंधानकर्ता मृत्युंजय कुमार को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए उनके खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 379 के तहत जांच के निर्देश दिए हैं। साथ ही आदेश की प्रति पुलिस अधीक्षक, पाकुड़ को भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने को कहा है। मामला लिट्टीपाड़ा थाना कांड संख्या 59/2025 से जुड़ा है। रविकांत रवि ने अपने जब्त वाहन (JH18L-5627) को मुक्त कराने के लिए न्यायालय में याचिका दायर की थी। निचली अदालत ने 7 अप्रैल 2026 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि वाहन के राजसात की कार्रवाई शुरू हो चुकी है।
इसके खिलाफ क्रिमिनल रिवीजन संख्या 34/2026 के तहत प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान पुलिस की रिपोर्ट में विरोधाभास सामने आया। अनुसंधानकर्ता मृत्युंजय कुमार ने 1 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में बताया था कि वाहन के राजसात की कार्रवाई उपायुक्त, पाकुड़ द्वारा शुरू कर दी गई है। वहीं 3 जुलाई 2026 को दाखिल दूसरी रिपोर्ट में उन्होंने कहा कि वाहन के संबंध में राजसात की कोई कार्रवाई शुरू ही नहीं हुई है।
अदालत ने यह भी पाया कि मामले में दर्ज भारतीय न्याय संहिता की धारा 281, 106(1), 125(a) और 125(b) में वाहन के राजसात का कोई प्रावधान नहीं है। इसे गंभीरता से लेते हुए अदालत ने निचली अदालत के 7 अप्रैल के आदेश को रद्द कर दिया और पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने टिप्पणी की कि अनुसंधानकर्ता की रिपोर्ट से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई और कोर्ट को गुमराह करने की स्थिति बनी। मामले में जांच और आगे की कार्रवाई के लिए एसपी पाकुड़ को दोनों रिपोर्टों की प्रतियां भेजने का निर्देश दिया गया है।






