250 मीटर की पुरानी रिपोर्ट के बाद अब 400 मीटर का फेर।
सूत्रों का दावा—फॉरेस्ट क्लीयरेंस के नाम पर 6 से 18 लाख तक की कथित मांग,सूत्र।
पाकुड़। पत्थर खदानों की लीज प्रक्रिया में फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट कारोबारियों के लिए जरूरी दस्तावेजों में से एक है। लेकिन पाकुड़ में इसी रिपोर्ट को लेकर कथित वसूली, दूरी के निर्धारण और बिचौलियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के दावों पर भरोसा करें तो पहले रिपोर्ट के नाम पर कथित तौर पर लाखों रुपये खर्च करने वाले पत्थर कारोबारियों को अब दोबारा रिपोर्ट लेने के लिए फिर जेब ढीली करनी पड़ रही है। आरोप है कि किसी से 6 लाख, किसी से 8 लाख, तो किसी से 12 से 18 लाख रुपये तक की मांग की जा रही है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।
पुरानी रिपोर्ट में 250 मीटर, अब नए सिरे से दूरी का सवाल।
सूत्रों के अनुसार, पूर्व में कई पत्थर कारोबारियों को जिला वन विभाग की ओर से खदान और वन क्षेत्र के बीच की दूरी 250 मीटर से अधिक दर्शाने वाली रिपोर्ट दी गई थी। आरोप है कि इस रिपोर्ट को हासिल करने के लिए कथित तौर पर भारी रकम चुकानी पड़ी। अब हाईकोर्ट के आदेश और दूरी संबंधी शर्तों को लेकर पैदा हुई स्थिति के बाद कारोबारियों को दोबारा रिपोर्ट की जरूरत पड़ रही है। इससे कई लोगों की लीज प्रक्रिया प्रभावित होने की बात कही जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पहले ही रिपोर्ट जारी की जा चुकी थी, तो अब नई रिपोर्ट में दूरी का निर्धारण किस आधार पर किया जा रहा है? क्या पुराने दस्तावेजों और वर्तमान नापी का मिलान हो रहा है? यदि जमीन की स्थिति वही है, तो रिपोर्ट में दूरी संबंधी विवरण बदलने की नौबत क्यों आ रही है? इन सवालों का जवाब संबंधित फाइलों और आधिकारिक आदेशों की जांच से ही मिल सकता है।
कथित ‘चावल के दानों’ की कीमत अलग-अलग, बिचौलिये की भूमिका पर भी सवाल।
सूत्रों का दावा है कि कथित लेन-देन के लिए ‘चावल के दाने’ सांकेतिक शब्द के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। आरोप है कि रिपोर्ट के लिए किसी से 6 चावल के दाने, किसी से 8 तो किसी से 12 और 18 चावल के दाने तक मांगे जाने की बातें सामने आई हैं। यह भी दावा किया जा रहा है कि रकम कथित तौर पर एक बाहरी व्यक्ति के माध्यम से एकत्र की जाती है और इस पूरी व्यवस्था में विभाग के एक कर्मचारी जो काफी करीब है साहब के की भूमिका होने की चर्चा है। यदि इन दावों में सच्चाई है, तो यह गंभीर जांच का विषय है। आखिर सरकारी रिपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया में किसी बाहरी व्यक्ति की भूमिका क्यों और कैसे बन रही है? क्या कारोबारियों से किसी रकम की मांग की जा रही है? इन सवालों की पुष्टि के लिए विभागीय रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।
पहले जमीन कटवाई, अब दूरी के नए मानक का सवाल।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ कारोबारियों ने पहले जंगल निर्धारित दूरी के भीतर होने की बात सामने आने पर अपने प्लॉट का क्षेत्रफल कम कराया, ताकि खदान की लीज प्रक्रिया आगे बढ़ सके। आरोप है कि इसके लिए भी कथित तौर पर लाखों रुपये खर्च किए गए। अब उन्हीं प्लॉटों के संबंध में नई रिपोर्ट में 400 मीटर से अधिक दूरी दर्ज किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि, प्रत्येक मामले में वास्तविक दूरी, प्लॉट की सीमा, वन क्षेत्र की अधिसूचना और लागू नियमों की जांच किए बिना यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि रिपोर्ट गलत है या नियमों का उल्लंघन हुआ है। लेकिन पुरानी और नई रिपोर्टों में यदि अंतर है, तो उसका आधार सार्वजनिक और स्पष्ट होना चाहिए।
नोटिफाइड फॉरेस्ट के नाम पर रिपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया भी जांच के दायरे में।
सूत्रों ने यह सवाल भी उठाया है कि वन क्षेत्र की किस श्रेणी के आधार पर दूरी तय की जा रही है। नोटिफाइड फॉरेस्ट, वन भूमि और वाइल्डलाइफ क्षेत्र से संबंधित प्रावधानों की व्याख्या को लेकर स्पष्टता जरूरी है। हाईकोर्ट के आदेश में वास्तव में क्या निर्देश दिए गए हैं और वे किन क्षेत्रों तथा परिस्थितियों पर लागू होते हैं, इसकी पुष्टि मूल आदेश और संबंधित सरकारी दिशा-निर्देशों से की जानी चाहिए। महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या सभी कारोबारियों के मामलों में समान नियम और समान प्रक्रिया अपनाई जा रही है? यदि अलग-अलग रिपोर्टों में अलग मानक लागू किए गए हैं, तो विभाग को उसका स्पष्ट आधार बताना चाहिए।
डीएफओ से मिलने एवं फोन के माध्यम से संपर्क का प्रयास।
इस मामले में जिला वन पदाधिकारी का पक्ष जानने के लिए मुलाकात और फोन के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया था लेकिन कार्यालय के बड़ा बाबू ने कहा कि साहब बहुत व्यस्त है कह कर हर बार टाल दिया गया और जब फोन के माध्यम से संपर्क करने की कोशिश की गई थी फोन पर भी संपर्क नहीं हो पाया। इस संबंध में विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है।
जांच हुई तो खुल सकता है रिपोर्ट जारी करने का पूरा हिसाब।
मामले की निष्पक्ष जांच के लिए पूर्व में जारी फॉरेस्ट क्लीयरेंस रिपोर्ट, रेंजर की नापी, वर्तमान दूरी संबंधी रिपोर्ट, संबंधित प्लॉटों के दस्तावेज और कथित आर्थिक लेन-देन के आरोपों की पड़ताल जरूरी है। कारोबारियों की शिकायतों को भी दर्ज कर उनका सत्यापन किया जाना चाहिए।
अब सवाल जिला प्रशासन और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से है—क्या रिपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया की जांच होगी? क्या पुराने और नए दस्तावेजों का मिलान कराया जाएगा? और क्या कथित बिचौलिये की भूमिका की पड़ताल होगी?






