सतनाम सिंह
पुरातन परंपराएं, संस्कृति और जीवनोपयोगी साधनों का आज भी महत्व बरकरार है
पाकुड़िया विज्ञान व भौतिकवाद ने चाहे असीमित विकास कर लिया है , लेकिन बावजूद इसके पुरातन परंपराएं, संस्कृति और जीवनोपयोगी साधनों का आज भी महत्व बरकरार है । इन्हीं कुछ मिसालों में से एक मिट्टी का घड़ा भी है। सिर्फ तीस रुपये में मिल जाने वाले इस देशी फ्रिज का समाज बड़ा तबका दीवाना है । इस बढ़ती हुई चिलचिलाती धूप एवं गर्मी को देखते हुए पाकुड़िया प्रखंड के मोंगलाबान्ध , आमकोना , गनपुरा , बाबुझूटी आदि अन्य गाँवों के मेहनती कुम्हारों द्वारा मिट्टी से निर्मित घड़े , सुराही गर्मी के इस मौसम में देशी फ्रीज का काम कर रहा है । विगत कई दिनों से अचानक बढ़ी गर्मी तथा चिलचिलाती धूप से सभी लोग परेशान हैं । सुबह नौ बजे से लेकर शाम चार बजे तक चिलचिलाती धूप और गर्मी का आलम यह है कि सड़कों पर लोगों का आवागमन न के बराबर देखा जा रहा है । इस गर्मी से राहत पाने के लिए ठंडे पानी की जुगाड़ अलग-अलग वर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग हैं । एक ओर सम्पन्न लोग इलेक्ट्रॉनिक फ्रिज का इस्तेमाल कर रहें हैं ।गर्मी से बेहाल लोग इलेक्ट्रिक फ्रिज का ठंडा पानी एक दम से पी लेते हैं जो सेहत, पेट व दांतों के लिए नुकसानदायक है, जबकि इसके मुकाबले घड़े का पानी ठंडा तो होता है पर नुकसानदेह नहीं होता । तो वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग के लोगों के लिए मिट्टी के बने घड़े की मांग अधिक है । ये घड़े ना सिर्फ गर्मी में लोगो को राहत पहुँचाते हैं बल्कि कुम्हार समाज के लिए जीवकोपार्जन का मुख्य साधन भी है । कुम्हारों द्वारा पाकुड़िया स्थित साप्ताहिक हाट शनिवार एवं मंगलवार को यहाँ मिट्टी निर्मित घड़ा बड़ी संख्या में उपलब्ध कराया जाता है , जिसे बेचकर कुम्हार व्यापारी अपनी रोजीरोटी सृजित करते हैं । पाकुड़िया प्रखंड के मोंगलाबान्ध, गणपुरा,आमकोना,जुगड़िया गाँव में कुम्हारो की संख्या सबसे अधिक है और उनकी जिंदगी मिट्टी एवं चाक से चलती है । कुम्भकार नीलकंठ पाल , गणपति पाल ,धरनी पाल , आंनद पाल , सत्यमान पाल , फागु पाल आदि ने बताया कि पूर्व के मुकाबले वर्तमान में इनकी बिक्री थोड़ी कम है । क्योंकि अभी बाजार में प्लास्टिक के घड़ा का भी कई लोग इस्तेमाल करते हैं लेकिन वह ठीक नहीं है इससे शरीर में नुकसान भी पहुंचा है ।यहां 50 रुपये से लेकर 150 रुपये तक का घड़ा मौजूद है । इन्होंने बताया कि इनका कारोबार उसी पुराने पारंपरिक अंदाज में चल रहा है । साथ ही जलावन , मिट्टी आदि अन्य सामान काफी मंहगा हो गया है । उन्हें सरकारी सहायता की सख्त जरूरत है । ताकि ये अपने कारोबार को और बढ़ा सके ।




