राशन कार्ड की गड़बड़ी और परिवार की बेरुखी के बीच वृद्धा का संघर्ष
बेटे-बहू ने छोड़ा सहारा, सरकारी व्यवस्था ने भी मोड़ी नजर
“झोला और कटोरी लेकर मांगने निकलती हूं: रुकमनी
सतनाम सिंह
पाकुड़: सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के दावों के बीच पाकुड़ जिले के सदर प्रखंड अंतर्गत सोनाजोड़ी पंचायत के पतरापाड़ा गांव की वृद्ध महिला रुक्मणी पुजहरनी आज भी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। उम्र के इस पड़ाव में जहां उन्हें सहारे और सम्मान की जरूरत है, वहीं वे सरकारी व्यवस्था की जटिलताओं और पारिवारिक उपेक्षा के बीच बेसहारा जीवन जी रही हैं।रुकमणी पुजहरनी ने भावुक होकर बताया कि उन्हें सिर्फ वृद्धा पेंशन मिलती है, लेकिन राशन कार्ड की समस्या के कारण सरकारी राशन नहीं मिल पाता। गांव के अन्य लोगों को कार्ड के माध्यम से चावल, दाल और अन्य सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन वे इससे वंचित हैं।उन्होंने बताया कि उनके राशन कार्ड में नाम की गड़बड़ी है। कार्ड पर दर्ज नाम उनके या उनके पति के नाम से मेल नहीं खाता। पहले किसी दूसरे के कार्ड के जरिए उन्हें करीब 5 किलो चावल मिल जाया करता था, लेकिन अब बायोमेट्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद वह सहारा भी खत्म हो गया।सबसे दर्दनाक पहलू उनकी पारिवारिक स्थिति है। रुक्मणी जी ने बताया कि उनके बेटे और बहू हैं, लेकिन वे अलग रहते हैं और उनकी देखभाल नहीं करते। वृद्ध महिला अकेले ही अपना जीवन काट रही हैं। जब उनसे पूछा गया कि वे अपना गुजारा कैसे करती हैं, तो उनकी आंखें नम हो गईं। उन्होंने कहा झोला और कटोरी लेकर मांगने निकल जाती हूं। जब अपने घर में मां-बाप को तकलीफ होती है तो कोई सहारा देता है, लेकिन मेरा कोई नहीं है… तो मैं क्या करूं?”रुकमणी पुजहरनी की यह कहानी सिर्फ एक वृद्ध महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि उन सरकारी योजनाओं की हकीकत भी दिखाती है, जो कागजों में तो मौजूद हैं लेकिन जरूरतमंदों तक सही तरीके से नहीं पहुंच पा रही हैं। गांव में लोग भी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक वृद्ध महिला को राशन और बुनियादी सुविधाओं के लिए दर-दर क्यों भटकना पड़ रहा है।अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेकर वृद्ध महिला को राहत दिलाने के लिए क्या कदम उठाता है।






