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October 21, 2026 10:36 pm

सिंदूर खेला के बाद नम आंखों से मां दुर्गा को विदाई, जयकारों के बीच निकली विसर्जन शोभायात्रा

पाकुड़ से हिरणपुर, महेशपुर और पाकुड़िया तक दिखा भक्ति-उल्लास का संगम, मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उमड़े श्रद्धालु।

पाकुड़। नौ दिनों की पूजा-अर्चना, भक्ति और उत्सव के बाद बुधवार को विजयादशमी पर मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ शारदीय दुर्गोत्सव का समापन हुआ। पाकुड़ जिले के विभिन्न पूजा पंडालों और मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। सुहागिन महिलाओं ने पारंपरिक सिंदूर खेला की रस्म निभाकर मां दुर्गा को विदाई दी। कहीं ढाक-ढोल की गूंज सुनाई दी, तो कहीं बैंड-बाजे और जयकारों के बीच विसर्जन शोभायात्रा निकली। मां की विदाई के समय श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। हर ओर अगले वर्ष मां के फिर आगमन की कामना गूंजती रही।

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सिंदूर खेला में छलकी आस्था, महिलाओं ने मांगा अखंड सौभाग्य।

विजयादशमी पर पाकुड़ के बड़ी दुर्गा मंदिर, कालिकापुर और रेलवे स्टेशन परिसर स्थित दुर्गा पूजा पंडाल सहित विभिन्न स्थानों पर सिंदूर खेला का आयोजन किया गया। सुहागिन महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर पारंपरिक रस्म निभाई। बंगाली समाज की इस पुरानी परंपरा के दौरान उत्सव का उल्लास और मां की विदाई का भावुक पल साथ-साथ नजर आया। हिरणपुर के डांगापाड़ा बंगाली टोला स्थित दुर्गा मंदिर सहित वैष्णवी दुर्गा मंदिर, मोयरा मोदक मंदिर, सार्वजनिक दुर्गा पूजा मंडप और शील दुर्गा मंदिर में भी महिलाओं ने सिंदूर खेला किया। लाल पाड़ वाली सफेद साड़ियों में पहुंचीं महिलाओं ने पूजा-अर्चना के बाद मां को सिंदूर, आलता और अन्य पारंपरिक सामग्री अर्पित कर विदाई दी। महेशपुर के श्मशान घाट के समीप स्थित कंकाली आश्रम में भी महिलाओं ने पान, सुपारी, धान, धूप और मिठाई अर्पित कर मां की पूजा की। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अगले वर्ष फिर मां के आगमन की प्रार्थना की।

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पाकुड़िया में निकली विसर्जन शोभायात्रा, मेले में उमड़ी भीड़

पाकुड़िया में विजयादशमी पर सिंदूर खेला में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं। कलश विसर्जन के बाद मंदिर परिसर में महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर परंपरा निभाई। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमाओं को कंधे पर लेकर गांव का भ्रमण किया गया। यज्ञ मैदान में आयोजित दुर्गा मेले में हजारों की संख्या में लोग पहुंचे। देर शाम बैंड-बाजे के साथ विसर्जन जुलूस निकाला गया। श्रद्धालु नाचते-गाते स्थानीय कापड़ी पोखर पहुंचे, जहां मां दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को श्रद्धापूर्वक विदाई दी गई। विसर्जन के दौरान दंडाधिकारी, थाना प्रभारी मनोज कुमार महतो और पुलिस बल विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात रहे।

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हिरणपुर में पूजा के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम

हिरणपुर प्रखंड के सार्वजनिक दुर्गा पूजा मंडप, मोयरा मोदक मंदिर, शील दुर्गा और सेन दुर्गा मंदिर सहित गोपालपुर, डांगापाड़ा, मोहनपुर, तोड़ाई, देवपुर और तारापुर में विजयादशमी की पूजा विधि-विधान से की गई। ढाक-ढोल की गूंज के बीच मां की विदाई हुई। दुर्गोत्सव के दौरान कहीं डांडिया और भक्ति जागरण का आयोजन हुआ, तो कहीं पश्चिम बंगाल से आए कलाकारों ने बाउल संगीत की प्रस्तुति देकर लोगों को मंत्रमुग्ध किया। मोहनपुर, डांगापाड़ा और हिरणपुर में लगे मेलों में भी लोगों की भीड़ रही।

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महेशपुर में कंकाली आश्रम से सार्वजनिक पूजा पंडालों तक उत्साह

महेशपुर प्रखंड मुख्यालय और आसपास के क्षेत्रों में भी दुर्गापूजा को लेकर उत्साह बना रहा। कंकाली आश्रम और भगत सिंह चौक स्थित सार्वजनिक दुर्गापूजा पंडाल सहित सीलमपुर, बड़कियारी, रोलाग्राम, सोनारपाड़ा, शहरग्राम, पोखरिया, रद्दीपुर, बलियापतरा, काठशल्ला, असकंधा, रामपुर, खांपुर और देवीनगर समेत विभिन्न स्थानों पर पूजा-अर्चना की गई। श्रद्धालुओं ने ढोल-ढाक और मां के जयकारों के बीच पूजा की। विजयादशमी पर प्रतिमाओं की विदाई के साथ नौ दिनों से चल रहा धार्मिक आयोजन संपन्न हुआ।

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पाकुड़िया में प्रतियोगिताओं ने बढ़ाया उत्सव का आकर्षण

पाकुड़िया दुर्गा मंदिर परिसर में अष्टमी की रात बच्चों के बीच मां दुर्गा की तस्वीर पर आधारित चित्रांकन प्रतियोगिता आयोजित की गई। प्रतियोगिता में सफल प्रतिभागियों को पूजा समिति की ओर से पुरस्कृत किया गया। नवमी की शाम आयोजित डांडिया नृत्य प्रतियोगिता में बच्चियों की आकर्षक प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया। दशमी पर विसर्जन और मेले के दौरान भी उत्सव का माहौल बना रहा। पूरे जिले में विजयादशमी के अवसर पर श्रद्धा, परंपरा और उल्लास का अनूठा संगम देखने को मिला। प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ दुर्गोत्सव संपन्न हुआ, लेकिन मां की विदाई के बाद श्रद्धालुओं के मन में अगले वर्ष उनके आगमन की प्रतीक्षा बनी रही।

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