राहुल दास
हिरणपुर (पाकुड़): जीवन मे सदगुरु की काफी महत्व है, जो हमे हर पल धर्मपथ पर चलने की राह दिखाती है। गुरुवार देरशाम हिरणपुर मे बजरंगबलि मंदिर समिति द्वारा आयोजित रामकथा के पांचवा दिन कथावाचक आचार्य रविशंकर ठाकुर ने प्रवचन देते हुए कहा। आचार्य ने आगे कहा कि गुरु शिष्य की परंपरा वर्षो से चली आ रही है। गुरु कोई भी हो सकता है , पर सद्गुरु न होना जीवन व्यर्थ है। स्वामी विवेकानन्द जब धर्मसंसद में भाग लेने शिकागो (अमेरिका) पहुंचे थे तो काफी तिरस्कार का सामना करना पड़ा था, उस वक्त उन्होंने अपने परम गुरु रामकृष्ण परमहंस को स्मरण किया। तब गुरु ने आदेश दिया कि नरेंद्र तुम आगे बढ़ो। इसके बाद स्वामी विवेकानन्द विश्वप्रसिद्ध हुए। भगवान राम भी बशिष्ठ ऋषि के सानिध्य में रहकर शिक्षा व संस्कार प्राप्त किया। उन्होंने आगे कहा कि भगवान राम , भरत , लक्ष्मण व शत्रुघ्न की जन्म पर अयोध्या में उत्सव का माहौल था। वेदों के अनुसार सभी का नामाकरण किया गया। देवताओ द्वारा पुष्प वृष्टि की जा रही थी। रामनवमी में लोग उत्साहित थे। इसलिए कहा जाता है कि अयोध्या जाने से सभी तीर्थों का पुण्य प्राप्त होता है। उन्होंने आगे कहा कि आज लोगो मे संवेदनाओं की भारी कमी दिख रही है। किसी के दुख में शामिल हो जाओ , यही संवेदना है। जो दूसरों की सम्पत्ति देखकर खुश रहे , यह सुखी व सन्तोषी व्यक्ति की पहचान है। बिन पूछे जो समर्पण हो जाये, वह भरत है व जो आज्ञा के बाद कर्म को पूर्ण करे, वो लक्ष्मण है। शत्रुता व्यक्त करने से बढ़ता है , कम बोलने से यह नही होती है। जब लक्ष्मण युद्ध के बाद बेहोश अवस्था मे पड़ा हुआ था , तब हनुमान संजीवनी पहाड़ को लेकर अयोध्या के रास्ते लौट रहा था। इस बीच शत्रु समझकर भाई भरत ने वाण भेदकर हनुमान को घायल कर दिया। उस वक्त हनुमान के मुंह से श्रीराम की शब्द सुनने पर काफी पछतावा हुआ , रामभक्त हनुमान का अभिमान भी टूटा। इसलिए बल का अभिमान कभी नही करना चाहिए। माता पिता का सदैव सेवा करने से ईश्वर की प्राप्ति होती है। इस अवसर पर आयोजक समिति के लक्ष्मी देवी , तपन ठाकुर , चन्दन दत्ता , मानस चक्रवर्ती आदि उपस्थित थे।





