पाकुड़: झारखंड सरकार के ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन’ और ‘एस्कैग संजीवनी’ के संयुक्त तत्वावधान में संचालित पाकुड़ सदर अस्पताल का नि:शुल्क डायलिसिस केंद्र इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रहा है.अस्पताल में बिजली और पानी की भारी किल्लत के कारण न केवल मरीजों का उपचार बाधित हो रहा है, बल्कि उनकी जान पर भी बन आई है.मरीजों और उनके परिजनों का आरोप है कि डायलिसिस की प्रक्रिया, जो मानक रूप से 4 घंटे की होनी चाहिए, उसे घटाकर डेढ़ से दो घंटे तक सीमित कर दिया गया है।
डायलिसिस कराने आए कैलाश महतो ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, आज मेरा डायलिसिस केवल डेढ़ घंटे ही हो पाया। जब मैंने विरोध किया, तो प्रशासन का कहना था कि न पानी की व्यवस्था है और न बिजली की। बोरिंग की समस्या के कारण हमें पूरा इलाज नहीं मिल रहा है।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव: धनंजय
डायलिसिस यूनिट के इंचार्ज धनंजय इंदी ने बताया कि एक मरीज के डायलिसिस के लिए कम से कम 200 लीटर शुद्ध पानी की आवश्यकता होती है।गर्मी के मौसम में भूजल स्तर गिरने से पानी की भारी किल्लत हो गई है। साथ ही, पाकुड़ जिले में बिजली की समस्या और आंधी-तूफान के कारण बिजली कटने से प्रक्रिया बीच में ही रुक जाती है। उन्होंने स्वीकार किया कि संसाधनों की कमी के कारण पहले शिफ्ट के मरीजों को केवल दो-दो घंटे ही डायलिसिस दिया जा सका।
परिजनों में आक्रोश और डर
मरीजों के परिजनों में शासन और प्रशासन के प्रति गहरा आक्रोश है। दीप राजवंशी, जो अपने पिता का इलाज कराने पहुंचे थे, उन्होंने बताया, डायलिसिस ही किडनी के मरीजों का एकमात्र सहारा है। अगर बीच में मशीन बंद हो जाए, तो मरीज की जान जा सकती है। यहाँ 24 घंटे बिजली और पानी का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए, लेकिन लापरवाही के कारण मरीज जोखिम में हैं। एक अन्य मरीज नासिरुल शेख, जो ढाई साल से यहाँ डायलिसिस करा रहे हैं, उन्होंने बताया कि समय की कमी के कारण मरीजों की सेहत गिर रही है और समय पर व्यवस्था न होने से मौतों का सिलसिला भी जारी है।स्थानीय लोगों और मरीजों ने सरकार से निम्नलिखित सुधारों की माँग की है अस्पताल परिसर में दो नई बोरिंग और बड़ी मोटर की व्यवस्था।डायलिसिस यूनिट के लिए 24 घंटे निर्बाध बिजली की आपूर्ति।मरीजों को पूर्ण 4 घंटे का डायलिसिस समय सुनिश्चित करना।अस्पताल की इस बदहाली ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर समस्या का समाधान कब तक निकाल पाता है, ताकि मरीजों को जीवनदान मिल सके।








