जिला संवाददाता अंकित कुमार लाल
पलामू: चैनपुर अंचल कार्यालय को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। क्षेत्र के विधायक आलोक कुमार चौरसिया ने विधानसभा में इस कार्यालय की कार्यशैली और जमीन से जुड़े विवादों को लेकर आवाज उठाई है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह आवाज सच में कार्रवाई तक पहुंचेगी या फिर सरकारी फाइलों में ही दबकर रह जाएगी।
कटाक्ष यह है कि चैनपुर अंचल कार्यालय की पहचान अब सरकारी व्यवस्था से ज्यादा जमीन के खेल के लिए होने लगी है। आम आदमी अपनी जमीन का कागज दुरुस्त कराने के लिए महीनों चक्कर लगाता है, जबकि भू-माफियाओं के लिए रास्ते मानो पहले से ही साफ दिखाई देते हैं।
स्थानीय लोग कहते हैं कि चैनपुर अंचल कार्यालय के आसपास अक्सर ऐसे चेहरे नजर आते हैं जिनका नाम जमीन के खेल में लिया जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इनमें से कुछ लोग राजनीतिक परिवारों की छाया में भी बताए जाते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब भू-माफिया और राजनीति का रिश्ता मजबूत हो, तो कार्रवाई की तलवार आखिर किस पर चलेगी?
विधानसभा में आवाज उठना निश्चित ही बड़ी बात है, लेकिन जनता का अनुभव कहता है कि कई बार ऐसे मामलों में जांच की घोषणा तो हो जाती है, पर असली खेल पर्दे के पीछे ही चलता रहता है। छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई दिखाकर मामला शांत कर दिया जाता है, जबकि असली खिलाड़ी बेखौफ घूमते रहते हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सच में चैनपुर अंचल कार्यालय की जांच के लिए स्पेशल टीम बनेगी, क्या भू-माफियाओं और उनके राजनीतिक संरक्षण पर भी हाथ डाला जाएगा, या फिर यह मामला भी वही पुरानी कहानी बनकर रह जाएगा—
“आवाज सदन में गूंजी, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला।”
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