पाकुड़। जिले के महेशपुर के साथ पाकुड़, हिरणपुर, लिट्टीपाड़ा, अमड़ापाड़ा और पाकुड़िया प्रखंड के कई ग्रामीण इलाकों में आदिवासी जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि कुछ मामलों में आदिवासी रैयत अपनी जमीन का सौदा 100 रुपये के स्टाम्प पेपर पर एफिडेविट बनाकर कर रहे हैं। जमीन खरीदने वाले कई लोग इसे वैध दस्तावेज मानकर लाखों रुपये खर्च कर मकान तक बना रहे हैं। बाद में विवाद सामने आने पर उन्हें जमीन और निर्माण दोनों को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
एफिडेविट से नहीं मिलता जमीन का मालिकाना हक
कानून के जानकारों के अनुसार केवल एफिडेविट, नोटरी एग्रीमेंट, इकरारनामा या पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए जमीन का मालिकाना हक खरीदार के नाम हस्तांतरित नहीं होता। खासकर आदिवासी भूमि के मामले में कानून में विशेष प्रावधान हैं। संथाल परगना क्षेत्र में एसपीटी एक्ट के प्रावधानों के तहत आदिवासी भूमि के हस्तांतरण पर विशेष प्रतिबंध लागू हैं। ऐसे मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और जहां आवश्यक हो, सक्षम प्राधिकारी की अनुमति का पालन जरूरी है।
कागज हाथ में, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में मालिक कोई और
एफिडेविट के आधार पर जमीन खरीदने वाले व्यक्ति के सामने सबसे बड़ा संकट राजस्व रिकॉर्ड को लेकर खड़ा हो सकता है। केवल ऐसे कागज के आधार पर खरीदार के नाम जमाबंदी खुलना या सरकारी रिकॉर्ड में मालिकाना हक दर्ज होना सुनिश्चित नहीं है। राजस्व अभिलेखों में मूल रैयत का नाम कायम रह सकता है। विवाद की स्थिति में खरीदार को अपने कथित अधिकार को साबित करने के लिए कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
मकान बना लिया तो भी नहीं होगी सुरक्षा की गारंटी
सबसे ज्यादा जोखिम उन खरीदारों को है, जिन्होंने एफिडेविट के आधार पर जमीन लेकर उस पर मकान या अन्य निर्माण कर लिया है। यदि सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी द्वारा हस्तांतरण को कानून के विरुद्ध माना जाता है और भूमि वापसी का आदेश होता है, तो खरीदार को जमीन के साथ अपने निर्माण को लेकर भी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में वर्षों की कमाई से बनाया गया आशियाना भी विवाद में फंस सकता है।
दलालों के झांसे में आकर न करें सौदा
ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन के ऐसे सौदों में बिचौलियों या दलालों की भूमिका की भी चर्चा सामने आती रही है। कम कीमत, तत्काल कब्जा और स्टाम्प पेपर के कागज दिखाकर लोगों को भरोसे में लेने के बाद जमीन का सौदा किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि आदिवासी जमीन के मामले में किसी भी प्रकार का भुगतान करने से पहले खाता, प्लॉट, जमाबंदी, रजिस्टर-II, पूर्व स्वामित्व, भूमि की प्रकृति और हस्तांतरण की वैधानिक अनुमति की पूरी जांच कराई जाए।
पाकुड़, महेशपुर, हिरणपुर, लिट्टीपाड़ा, अमड़ापाड़ा और पाकुड़िया प्रखंड के ग्रामीणों से अपील है कि केवल एफिडेविट या स्टाम्प पेपर देखकर आदिवासी जमीन का सौदा न करें। निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की पुष्टि किए बिना जमीन खरीदना भविष्य में भारी आर्थिक और कानूनी नुकसान का कारण बन सकता है।






