भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता सह कोर कमेटी के सदस्य सत्य शिक्षानंद मुर्मू ने संयुक्त रूप से पुष्प एवं माला पहना कर नमन कर आशीर्वाद लिया
बिक्की सन्याल
पाकुड़। अमडापाडा प्रखंड क्षेत्र के सिंगारसी पंचायत अंतर्गत गौरपाड़ा गांव में 238 वीं पुण्य स्मृति में जबरा पहाड़िया उर्फ तिलकामांझी की आदमकद प्रतिमा का अनावरण मुख्य अतिथि भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता सह कोर कमेटी के सदस्य सत्य शिक्षानंद मुर्मू ने संयुक्त रूप से पुष्प, एवं फूल माला पहना कर नमन कर आशीर्वाद लिया। उक्त कार्यक्रम में दामिन क्षेत्र के साहिबगंज, दुमका गोडडा एवं पाकुड़ जिले से प्रतिनिधियों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। सत्य शिक्षानंद मुर्मू ने उपस्थित जनसमूहों को जवरा पहाड़िया उर्फ तिलकामांझी की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कभी ना रुकने वाली लंबी लड़ाई लड़ी बाबा तिलका मांझी महान क्रांतिकारी तिलका माझी की कार्यशैली पहाड़िया धरती की प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, पहाड़िया आदिम जनजाति की सांस्कृतिक पहचान को अचुन्न रखना, चुंकि पहाड़िया की संस्कृति पहचान और प्राकृतिक संसाधनों का बाहरी लूटेरों से हमेशा से संघर्ष करना पड़ा था, क्योंकि बाहरी लोग सिर्फ और सिर्फ लूटने का काम किया। यही वजह था कि तिलकामाझी ने भागलपूर के प्रथम कलेक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को छाती पर तीर यू मार कर सदा के लिए नींद सुला दिया, जिससे अंग्रेजों के दांत खट्टे हुए थे। ब्रिटिश कंपनी ने बदले में प्रखंड के सिंगारसी पहाड़ से 7 घोड़ों में बंध कर भागलपुर तक घसीट कर ले गया। बाबा तिलकामांझी गुलामी नहीं, फांसी को स्वीकारा। भागलपुर चौक (वर्तमान तिलकमांझी) स्थित बरगद पेड़ पर अपनी प्राण की आहुति पहाड़िया समाज के नाम सदा के लिए स्वयं को हंसते हंसते कुबार्नी दी फांसी के फंदे को चूमा तथा वीरगति प्राप्त की। संघर्ष के परिणाम सन 1772 ई 1300 सैनिक दल का गठन सन 1782 ई हिल रेंजर्स ( पहाड़िया परिषद्) का गठन, सन 1823 ई 1356 वर्ग मिल दामिन ई कोह का ताड़गाछ से घेर कर स्वायत्तता देना, और जगह जगह पर दामिन डाक बंगला स्थापित किए गए और उसके अंदर 26 बाजार बसाया गया आज भी मौजूद है। सन 1882 ई में सैरिया कंट्री (पहाड़िया राज) का दर्जा दिया गया है। विडंबना है कि केंद्र तथा राज्य सरकार के द्वारा जबरा पहाड़िया उर्फ टिलका मांझी की लगातार उपेक्षा की जा रही है। जबकि झारखंड में सभी महापुरुषों को सम्मान दिया जाता रहा है और सरकारी तथा गैर सरकारी परिसरों, चौक, चौराहों पर प्रतिमा का स्थापित किया जाता रहा है परंतु टिलका मांझी की प्रतिमा के लिए 5 फुट की भी जमीन नहीं दि जा रही है, यह उपेक्षा का इसे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है। आज के इस कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने संकल्प लिया कि सन 1823-24 में 1356 वर्ग मील दामिन-ई- कोह घेराबंदी को मारमती पुनः ताड़गाछ से की जाएगी है। आजादी देश भारत में शाजिस के तहत पिलर को तोड़ा जा रहा है और ताड़ गाछ को तहस नहस किया जाता रहा है और पहाड़िया की पहचान को मिटाने की पर जोर कोशिश हो रही है। इस रोकना बहुत ही जरूरी है। पहाड़िया समाज दामिन क्षेत्र के अंदर जबरा पहाड़िया उर्फ तिलकामांझी की प्रतिमा का स्थापना प्रत्येक गांव में ग्राम प्रशासक समिति के निर्णय से प्रतिमा निर्माण में आने वाले सभी खर्च गांव के सहयोग से किया जाएगा ताकि हमें सन 1884 ईस में अलग सौउरिया कंट्री (पहाड़िया राज्य) को नोटिफाइड आदेश का अनुपालन करा सके संवैधानिक अधिकार अनुच्छेद 243 (1) तहत 5 वीं अनुसूचित क्षेत्र में झारखंड पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार) पी पी ई एस ए कानून 1996, 24 दिसंबर को अस्तित्व आया है। 26 साल गुजर गया, लेकिन लागू करने को सरकार नाकाम रही है झारखंड सरकार हटधार्मिकता से बाहर आएं और झाखंड के हित में नियुक्ति नियमावली खतियान 1932 के अनुसार तय करें सरकार। शाहिदे आजम जबरा पहाड़िया उर्फ तिलका माझी के नाम 11 फरवरी को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करे सरकार। वर्तमान झारखंड के भाषा को प्राथमिकता के तहत आदिम जनजाति पहाड़िया की मालतो एवम माड़वो भाषा को शामिल किया जाना आवश्यक है। मौके पर अनिल पहाड़ियां, सुनील पहाड़िया, शिवप्रसाद पहाड़िया, जमुनाथ पहाड़िया, मुंशी मुर्मू आदि ने सभा को संबोधित किया।





