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March 14, 2026 9:09 am

तैयारी पूरी, बाजे गाजे के साथ आज निकलेगी भव्य रथ यात्रा

राजकुमार भगत

पाकुड़। पाकुड़ रथ यात्रा का इतिहास बहुत ही पुराना है। राज परिवार से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1697 में राजा पृथ्वी चंद्र शाही के समय प्रारंभ हुई रथयात्र पूरे रीति-रिवाज व भव्यता के साथ आज भी जारी है । राजपाट बदले, कई उथल-पुथल हुये, कई पीढ़ियाँ गुजर गई, समाज में बहुतेरे बदलाव आये लेकिन रथयात्रा पिछले लगभग 326 वर्षों से ईश्वर की असीम अनुकंपा और समाज के सक्रिय सहयोग से बदस्तूर आज भी जारी है।पहले यह रथ नीम की लकड़ी का हुआ करता था।वर्ष 1929 में श्रद्धेय स्वर्गीय रानी ज्योतिर्मयी देवी ने पीतलआदि अष्टधातु के भव्य रथ का निर्माण करवाया व पहली बार राधा रानी और भगवान मदनमोहन को रथ पर विराजमान कर रथ यात्रा शुरू की । उस समय रथ में पीतल का घोड़ा भी हुआ करता था।आरम्भ से ही पहाड़िया समाज के सनातनी रथयात्रा में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते रहे हैं। तब रथ मैं सवार भगवान अपने निजधाम से निकलकर मौसी बाड़ी में 8 दिन समय व्यतीत करते थे। उस समय जो आज का रानी ज्योतिर्मयी स्टेडियम है में एक विशाल चऊतरा हुआ करता था ।जिसमे ताड़ के पत्तों से बने घर में भगवान मदन मोहन 8 दिन व्यतीत करते थे। उनका रथ उसी स्थान पर रहता था। 8 दिन के पश्चात भगवान मदन मोहन उसी रथ पर सवार होकर पुनः अपने निजधाम राजबाड़ी स्थित मंदिर के लिए प्रस्थान कर जाते थे।
वर्तमान में “रानी ज्योतिर्मयी देवी देवोत्तर इस्टेट” के सेवायतगण श्रीमती मीरा प्रवीण सिंह, देब मोहन, अमित पांडेय, अभिजीत पांडेय और अरिजीत पांडेय के द्वारा पूजा-अर्चना की सारी व्यवस्था की जाती है।पूजा-अर्चना का कार्य पंडित भरत भूषण मिश्र संपन्न करवाते हैं।वर्तमान में राधा रानी और भगवान मदनमोहन की रथयात्रा राजापाड़ा स्थित माँ नित्यकाली मंदिर से चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच , बाजे गाजे के साथ अपराहन 4:00 बजे राजापाड़ा, हाटपाड़ा, भगत पाड़ा मुख्य सड़क होते हुये बिल्टू स्कूल तक जाती है और फिर उसी मार्ग से वापस होते हुए कालीबाड़ी पहुँचती है। इस दौरान भक्तजन पान बताशा आदि चढ़ाकर भगवान मदन मोहन के पूजा अर्चना करते हैं। तत्पश्चात राधा रानी और भगवान मदनमोहन कालीबाड़ी स्थित रंगमहल में विराजमान हो जाते हैं।अगले आठ दिनों तक रंगमहल में ही वे विश्राम करते हैं। जहां उनकी दोनों शाम विधिवत पूजा अर्चना की जाती है। 8 दिनों के पश्चात पुनः भगवन रथ पर सवार हो कर उसी रास्ते से वापस अपने प्रासाद, जो राजबाड़ी के प्रांगण में स्थित है, में विराजमान हो जाते हैं।पाकुड़ की धरती भगवान मदनमोहन की धरती के रूप में जानी जाती है।इस शुभ अवसर पर देवोत्तर के सेवायतगणों ने सभी को रथयात्रा की हार्दिक शुभकामनाएँ दी हैं और यह कामना की है कि भगवान सभी पाकुड़ वासियों सहित सभी का मंगल करें।

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